भारतीय संस्कृति व संचार पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन

Updated: Aug 5

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के महाराजा अग्रसेन कालेज में भारतीय संस्कृति व संचार पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य पत्रकारिता के विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति एवं संचार के विषयों पर विस्तार से बताना व जागरूक करना था।



सम्मेलन शुक्रवार 11 मार्च से शनिवार 12 मार्च तक चला। दोनों दिन कार्यक्रम सुबह साढ़े नौ से शाम साढ़े पांच बजे तक चला। दोपहर साढ़े 12 से डेढ़ बजे तक लंच ब्रेक रहा। तकनीकी स दोपहर दो बजे से शाम चार बजे तक चला।कार्यक्रम के मुख्यत्र अतिथि के रूप में एनबीटी के सदस्य रहे प्रो. वलदेव भाई शर्मा, डॉ. नीरज करण सिंह, डॉ. उमेशचंद्र पाठक, डॉ. शेफाली ओझा, प्रो. अरुण भगत, अरविंद सिंह, प्रतिमा वत्स मौजूद थीं। साथ ही कॉलेज के पत्रकारिता विभाग के शिक्षक सुधीर के रिंटन, योगेश्वर सिंह, विनय कुमार रॉय, रचिता कौलधर, डॉ. के. न्यूमे, डॉ. श्रुति गोयल और डॉ. विवेक विश्वास उपस्थित थे। सम्मेलन की अध्यक्षता प्रो. उमेश आर्य (डीन और अध्यक्ष, मीडिया अध्ययन संकाय, गुरु जम्भेश्वर विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, हिसार) ने की। सत्र का संचालन डॉ नीरज कर्ण सिंह ने किया।


प्रो. बलराम पाणि ने किया उद्घाटन

उद्घाटन सत्र की शुरुआत दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के डीन प्रो. बलराम पाणि ने मुख्य भाषण देते हुए की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा, "संस्कृति और संचार एक दूसरे के पूरक हैं।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संस्कृति और संचार से संबंधित शोध पत्र कॉलेज पुस्तकालय के अभिलेखागार में उपलब्ध कराए जाएं।। प्राचार्य डॉ. संजीव तिवारी ने अतिथियों को अंग वस्त्र व तुलसी का पौधा देकर सम्मानित किया।


अपने भाषण में, प्रो. सुनील सोंधी, परियोजना निदेशक, संस्कृति और संचार परियोजना, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, ने उल्लेख किया कि अनुसंधान में वास्तविकता का स्पर्श होना चाहिए और इसे समाज के जमीनी स्तर से जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने आगे टिप्पणी की कि छात्रों का आज पश्चिमी संस्कृति के प्रति अधिक झुकाव है। हालाँकि, समय की आवश्यकता है कि हम अपनी स्वदेशी संस्कृति को पहचानें और जनता, विशेषकर युवाओं के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए उचित पहल करें।

एक अन्य गणमान्य व्यक्ति, अध्यक्ष, श्री अतुल कुमार जैन हमें स्वामी विवेकानंद के समय में ले गए। उन्होंने बताया कि कैसे स्वामी एक अनुकरणीय वक्ता थे और आज तक छात्रों और युवाओं के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। इसके अलावा, उन्होंने छात्रों को व्यावहारिक अनुभव प्रदान करने के लिए विभिन्न मीडिया घरानों के सहयोग से कॉलेज में संचालित किए जा सकने वाले अल्पकालिक पाठ्यक्रमों के महत्व पर प्रकाश डाला।


संचार के कारण ही संस्कृति विकसित होती है: प्रो. उमेश

सम्मेलन के दौरान प्रो. उमेश ने कहा कि संचार के कारण ही संस्कृति विकसित होती है। संचार को समझना है तो भारतीय संस्कृति समझनी होगी। भारतीय संस्कृति में संचार के कई क्षेत्र हैं। हमने अपनी मौलिक परंपराओं को छोड़ दिया। संचार की विद्या को लेकर कोई सार्थक कार्य नहीं किया। हमें जो मिला वही अपनाया। संचार एक बड़े क्षेत्र तक पहुंचकर उनकी जीवन शैली बन जाती है। उन्होंने छात्रों को आत्मनिरीक्षण के बारे में बताया।


GGSIP कॉलेज के एसोसिएट प्रो. डाॅ. उमेशचंद्र पाठक ने भोजपुरी संस्कृति व संचार विषय पर चर्चा की। कहा कि भोजपुरी का क्षेत्र विस्तृत है। बिहार के आरा, छपरा, सिवान, रोहतास, मोतिहारी, बेतिया, रांची, धनबाद व जमशेदपुर के कुछ हिस्सों के अलावा यूपी में कई जगहों पर भोजपुरी का प्रभाव है।

GGSIP कि डॉ. सेफाली अहूजा ने भारत की संस्कृति व संचार विषय पर छात्रों को जानकारी दी। कहा कि संस्कृति किसी भी देश, जाति व समुदाय की आत्मा होती है। इससे देश, जाति या समुदाय के उन समस्त संस्कारों का बोध होता है, जिनके सहारे वह अपने आदर्शों, जीवन मूल्यों, आदि का निर्धारण करता है।

बिहार लोक आयोग के सदस्य प्रो. अरुण भगत ने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। RSTV पूर्व संपादक अरविंद सिंह ने पत्र लेखन की संस्कृति के बारे में बताया। कहा कि इसे स्कूली पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया गया है। प्रसिद्ध लेखक और स्तंभकार प्रतिमा वत्स ने लोक संस्कृति व संचार के बारे में बताया। कहा कि लोक संस्कृति कभी भी शिष्ट समाज की आश्रित नहीं रही है। उल्टे शिष्ट समाज लोक संस्कृति से प्रेरणा प्राप्त करता रहा है। लोक संस्कृति का एक रूप हमें भावाभिव्यक्तियों की शैली में भी मिलता है। इससे लोक-मानस की मांगलिक भावनाओं से ओत प्रोत होना सिद्ध होता है।


विविधताओं से भरी हुई है भारतीय संस्कृति: प्राचार्य

कार्यक्रम में प्राचार्य प्रो. संजीव कुमार तिवारी ने कहा कि हमारी संस्कृति विविधताओं से भरी हुई है। इसे बचाने की जरूरत है।"सर्वश्रेष्ठ नेता वे हैं जो सबसे अच्छा संवाद करते हैं।" उन्होंने भारतीय संस्कृति और विरासत के महत्व के बारे में भी बात की। साथ ही यह भी कहा की समय की मांग है कि ऐसे पत्रकार हों जो अपनी संस्कृति से जुड़े हों और इसके सार का प्रसार कर सकें।


जीवन का मूल कर्तव्य संस्कृति: प्रो. बलदेव भाई शर्मा

वहीं मुख्य अतिथि रहे प्रो. बलदेव भाई शर्मा (कुलपति, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर) ने कहा कि जीवन का मूल कर्तव्य संस्कृति है। यह मनुष्यता के बोध का विस्तार करती है। हमारे जीवन की चैतन्यता है। उन्होंने विवेकानंद का भी उल्लेख किया। बताया कि स्वामी विवेकानंद ने किस तरह हमारी संस्कृति को विदेशों में फैलाने में मदद की। ऋगवेद को यूनेस्को भी प्राचीन मानवता का स्रोत मानता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने एक हजार वर्ष पहले ही बताया था कि विश्व का कल्याण कैसे हो सकता है। पत्रकारिता पर चर्चा करते हुए प्रो. बलदेव ने कहा कि पत्रकार बुद्धिजीवी नहीं समाजजीवी है। संस्कृति बुद्धिजीवी को समाजजीवी बनाने का कार्य करती है।

छात्राें ने दिखाए प्रजेंटेशन, प्रो. बलदेव ने दिए प्रमाण-पत्र

अन्य वक्ताओं ने कहा कि आज यह जानना होगा कि कैसे हम स्वयं को समझकर जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। सम्मेलन में पत्रकारिता के कॉलेज के सभी छात्र मौजूद थे।कुछ अन्य कालेजों के भी छात्र थे, जिन्होंने इस विषय पर प्रजेंटेशन भी दिया। प्रजेंटेशन देने वाले अमेटी की नव्या अग्रवाल, अदिति राय व महाराजा अग्रसेन कालेज के अनिकेत सिंह चौहान, नेहा रानी, मनू कौशिक, श्रेया बंसल, प्रगति चौधरी व शिवम गुप्ता को प्रो. बलदेव ने प्रमाण-पत्र दिया। सम्मेलन का समापन आईजीएनसीए की ओर से श्री मोहित जोशी और महाराजा अग्रसेन कॉलेज के पत्रकारिता विभाग के टीआईसी डॉ. सुधीर कुमार रिंटेन द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।


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