निजीकरण से देश को कितना फायदा? आखिर क्यों पड़ रही इसकी जरूरत?

Updated: Aug 5

सरकार का मानना है कि निजीकरण (Privatization) से देश की तंगहाली कम होगी। आम लोगों को भी बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। हां, इसके लिए उन्हें अधिक रकम चुकाने पड़ सकते हैं। सरकारी संपत्तियां निजी हाथों में जाएंगी तो इसका बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी साफ कर चुके हैं कि व्यवसाय करना सरकार का काम नहीं।

privatization

ज्योति सिंह, नई दिल्ली। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 2019-20 की जनवरी से मार्च में तीन प्रतिशत बढ़ी थी। 2020-21 में 7.3 की गिरावट आई। 2019-20 में यह चार प्रतिशत बढ़ी थी। यह कोरोना महामारी के कारण आर्थिक असर को दिखाता है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि देश अभी आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। सरकार इस आर्थिक तंगी से उबरने का हर प्रयास कर रही है। इसके लिए एक बार फिर निजीकरण की ओर केंद्र का ध्यान गया है। सरकार अपनी संपत्तियों व व्यवसायों को निजी हाथों में देना चाहती है। इससे धन जुटाना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साफ भी कर चुके हैं कि व्यवसाय करना सरकार का काम नहीं है। यह उन्हें किया जाने देना चाहिए जो इसे बेहतर तरीके से कर सकते हैं। केंद्र सरकार अभी विनिवेश पर ज्यादा ध्यान दे रही है। सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी बेचकर मोदी सरकार अपना राजस्व बढ़ाना चाहती है। नरेंद्र मोदी कुछ सार्वजनिक संपत्तियों को छोड़कर बाकी में निजीकरण करना चाहते हैं। 1991-92 में सरकार ने विनिवेश से तीन हजार करोड़ से अधिक रुपये जुटाए थे। तब लक्ष्य महज 25 सौ करोड़ ही जुटाने का था। 2013-14 में सरकार ने 56 सौ के बदले महज 26 सौ करोड़ ही जुटाए थे। 2017-18 में एक लाख करोड़ व अगले साल 85 हजार करोड़ जुटाने में सफल रही थी। इस बार एक लाख करोड़ से अधिक जुटाने का लक्ष्य है।

सरकार से घटेगा आर्थिक बोझ, बढ़ेगा राजस्व

आज देश में जरूरत है निजीकरण की। लोगों को रोकने के लिए भी यह जरूरी है। क्योंकि अगर देश में कहीं दंगे या बवाल होते हैं तो सबसे ज्यादा क्षति सरकारी संपत्तियों को ही पहुंचाई जाती है। फिर सरकार को उसे ठीक कराने में करोड़ों खर्च करने पड़ते हैं। इससे सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। ट्रेन, स्कूल या सरकारी अस्पतालों को ही देख लें। हम जहां चाहें वहां गंदगी फैलाते रहते हैं। थोड़ी-थोड़ी सी बात पर तोड़फोड़ कर देते हैं। हमें पता है, सरकार कुछ नहीं करेगी। क्या आपने सोचा है कि कभी प्राइवेट अस्पतालों या निजी विमानों में ऐसा करने पर क्या हो सकता। ऐसे में इन छोटी-छोटी नुकसानों से भी बचने के लिए सरकार नियंत्रण करने वाले हाथ ही बदल देना चाहती है। इससे सरकार से आर्थिक बोझ भी कम होगा। राजस्व भी बढ़ेगा। पिछली बार वाजपेयी सरकार में अरुण शौरी ने ऐसा किया था। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर अमल कर रहे हैं। इस पर भी जरूर सोचा जाना चाहिए कि निजीकरण से सरकारी कंपनियों की सेवाएं भी और बेहतर होंगी। व्यवस्था सुधरेगी। इसका सीधा लाभ लोगों को मिलेगा। सरकार का भी शायद यही मकसद है।


एकाधिकार होने पर निजी कंपनियां करेंगी मनमानी

शुरुआत में तो ऐसा लग रहा कि निजी कंपनियों के आने से बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। कुछ लोग इसके पक्ष में हैं, लेकिन अगर उनका एकाधिकार हो गया तो फिर आम जनता के लिए मुश्किल होगी। एकाधिकार होने पर निजी कंपनियां मनमानी करेंगी। सुविधा के नाम पर मनमाना शुल्क वसूल करेंगी। देश के महज दस प्रतिशत अमीर लोग इसका शुल्क चुका देंगे, लेकिन गरीबों का क्या होगा। वे तो रोटी-कपड़ा और मकान जुटाने में ही आर्थिक रूप से कमजोर बने रहेंगे। जैसे बीएसएनएल को बढ़ने के लिए स्पेक्ट्रम ही नहीं दिया गया। बाजार में अब जियो व एयरटेल जैसी कंपनियों का बोलबाला है। ऐसे में अब इंकमिंग के लिए भी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इन कंपनियों ने बीएसएनएल के संसाधन को ही अपने बढ़ने के लिए उपयोग किया।


दूरदराज के लोगों तक पहुंच नहीं बल्कि मुनाफा कमाना होगा मकसद

निजी कंपनियों का मकसद केवल पैसे कमाना होता है। बैंकिंग सेक्टर को ही देखें तो निजी बैंक शहरों पर ही ध्यान देते हैं। उन्हें मोटे पैसे वाले ग्राहक चाहिए। खाता खोलने के लिए भी कम से कम पांच हजार रुपये चाहिए। मेट्रो सिटी में यह राशि 15 से 20 हजार रुपये तक है। ऐसा नहीं है कि मेट्रो सिटी में गरीब नहीं रहते। ऐसे में अगर उन्हें महज खाता खुलवाना हो तो 15 से 20 हजार रुपये चाहिए। उनके ब्रांच छोटे शहरों में नहीं होते। सरकारी बैंक ही कस्बों तक पहुंच सकी है। डाकघर इसका प्रमुख उदाहरण है। ऐसे में देश के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों को न सिर्फ जिंदा रखना, बल्कि उनका विकास भी जरूरी है।


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How much does the country benefit from privatization? Why is it needed after all?


The government believes that privatization will reduce the country's troubles. Common people will also get better facilities. Yes, they may have to pay more for this. If government assets go into private hands, it will be put to better use. Prime Minister Narendra Modi has also made it clear that doing business is not the job of the government.


Jyoti Singh, New Delhi. The Gross Domestic Product (GDP) grew by three percent in January to March of 2019-20. There was a decline of 7.3 in 2020-21. It had increased by four per cent in 2019-20. This shows the economic impact due to the corona pandemic. In such a situation, we can say that the country is still facing financial crisis. The government is making every effort to overcome this financial crisis. For this once again the attention of the Center has turned towards privatization. The government wants to give its properties and businesses to private hands. Wants to raise money from this. Prime Minister Narendra Modi has also made it clear that doing business is not the job of the government. It should be allowed to those who can do it better. The central government is now focusing more on disinvestment. The Modi government wants to increase its revenue by selling stake in public sector banks. Narendra Modi wants to privatize the rest, barring a few public properties. In 1991-92, the government had raised more than three thousand crore rupees through disinvestment. Then the target was to raise only 25 hundred crores. In 2013-14, the government had raised only 26 hundred crores instead of 56 hundred. It was successful in raising one lakh crores in 2017-18 and 85 thousand crores the next year. This time the target is to raise more than one lakh crores.

Government will reduce economic burden, revenue will increase

There is a need for privatization in the country today. It is also necessary to stop people. Because if there are riots or riots somewhere in the country, then the maximum damage is done to the government properties. Then the government has to spend crores to fix it. This increases the financial burden on the government. Just look at trains, schools or government hospitals. We keep littering wherever we want. They sabotage every little thing. We know the government will not do anything. Have you ever thought what can happen if you do this in private hospitals or private planes. In such a situation, to avoid even these small losses, the government wants to change the controlling hands. This will also reduce the financial burden from the government. Revenue will also increase. Arun Shourie did this last time in the Vajpayee government. Now Prime Minister Narendra Modi is implementing it. It must also be thought that with privatization, the services of government companies will also be better. The system will improve. People will get direct benefit of this. Perhaps this is the aim of the government as well.


Private companies will be arbitrary if there is a monopoly

Initially, it seemed that with the arrival of private companies, better facilities would be available. Some people are in favor of it, but if they have a monopoly then it will be difficult for the general public. Private companies will be arbitrary if there is a monopoly. Arbitrary fees will be charged in the name of convenience. Only 10 percent of the rich people of the country will pay its fee, but what will happen to the poor. They will remain financially weak only in procuring bread and clothes and houses. Like BSNL was not given spectrum to grow. The market is now dominated by companies like Jio and Airtel. In such a situation, now money has to be spent for income also. These companies used the resources of BSNL for their growth.


The purpose will be to earn profit, not reach remote people

The purpose of private companies is only to make money. If we look at the banking sector itself, private banks focus only on cities. They want big money customers. At least five thousand rupees are required to open an account. In metro city this amount ranges from 15 to 20 thousand rupees. It is not that the poor do not live in metro cities. In such a situation, if they just want to open an account, then they need 15 to 20 thousand rupees. Their branches are not in small towns. Only government banks have been able to reach the towns. The post office is a prime example of this. In such a situation, it is necessary for the country not only to keep the public sectors alive, but also to develop them.


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