आखिर कब तक सरकारें नहीं कराएगी जातीय जनगणना ?

Updated: Aug 5

देश में आखिर कौन लोग हैं जो जातियों की सच्चाई सामने लाना नहीं चाहते। क्या वे कांग्रेस या बीजेपी के हैं? हम नहीं जानते। हां, इतना जरूर है कि आजाद भारत में पांच हजार करोड़ खर्च तक जो आंकड़े जुटाए गए वो देश को नहीं दिखाए गए।


ज्योति सिंह, दिल्ली। सदियों से मजे कर रहे लोग हर बार जातीय जनगणना का विरोध करते हैं। उन्हें डर है कि अगर जनगणना के बाद वास्तविक आंकड़े सामने आ गए तो फिर पिछड़ों का बोलबाला हो जाएगा। देश के संसाधनों पर उन्ही मुट्ठी भर लोगों का अधिकार है, जो आज विरोध कर रहे हैं। सरकारें भी उनका साथ देतीं हैं। हालांकि मनमोहन सरकार ने इस पर विचार करने का भरोसा जरूर दिया था, लेकिन जातिय जनगणना करा नहीं पाई। हमारे देश में नौकरी, चुनाव यहां तक कि मकान किराये पर देने से पहले जाति पूछ ली जाती है। ऐसे में सरकारें कब तक जातीय जनगणना नहीं कराएगी। कई राज्य की सरकारें भी जातिगत जनगणना की मांग कर रही है। बिहार विधान मंडल व विधानसभा में पहले से ही प्रस्ताव पारित है। महाराष्ट्र विधानसभा में भी इसके मांग को सही बताया गया है। ओडिशा और यूपी में भी कई राजनीतिक दलों ने जातिगत जनगणना की मांग की है। ऐसे में केंद्र इनकी बातों को अनसुना कर रहा है।


जातिगत जनगणना से राजनीतिक पार्टियों का मजबूत होगा समीकरण

राज्यों में जाति हावी है। विकास के मुद्दों को किनारे कर लोग अपनी जाति के पार्टी को वोट देते हैं। मतदान के एक दिन पहले तक सब कुछ ठीक होता, लेकिन वोटिंग के दिन सब बदल जाता। इसका फायदा क्षेत्रिय राजनीतिक पार्टियां भी उठाती हैं। अगर जातिगत जनगणना हुआ तो राजनीतिक पार्टियों को और मजबूत आधार मिलेगा। अब तक क्षेत्रिय पार्टियां केवल अनुमान के आधार पर चुनावों में दावा करती है। वोटरों को अपने पक्ष में करती है। अधिक बार वह इसमें कामयाब भी होती है। ओबीसी से आने वाले मतदाताओं का चुनावों पर अधिक प्रभाव होता है। भाजपा के हिन्दुत्व का झंडा भी इन्हीं जातियों की बदौलत चलता है। यही कारण है कि सभी राजनीतिक पार्टियों को इस जाति के वोटरों पर नजर है। आंकड़ों के अनुसार 2014 में तो खुलकर इस जाति के वोटरों ने लोकसभा में भाजपा के पक्ष में वोटिंग की थी।


क्यों जरूरी है जातिगत जनगणना ?

जातिगत जनगणना से सरकार पता लगा सकती है कि किस जाति के कितने लोग हैं। ऐसे में उन्हें मिलने वाली सुविधाएं भी दी जा सकती हैं। सामाजिक कल्याण विभाग की कई ऐसी योजनाएं हैं, जो योग्य लाभुकों तक पहुंचती ही नहीं। इस राशि का बंदरबाट कर लिया जाता है। कहा जा रहा कि इससे जातिवाद बढ़ेगा, लेकिन क्या अब तक देश से जातिवाद खत्म हो गया है? इसका उत्तर होगा नहीं। हां शुरू में हो सकता है कि संघर्ष बढ़े। कई जातियां खुले तौर पर आरोप लगा सकतीं हैं कि उन्हें उपेक्षित किया गया है। वैसी जातियां आज बिना जनगणना के भी आरोप लगा रहीं हैं। हां, अगर जातिगत जनगणना हुई तो उनके समाज से नये नेता निकलेंगे। वे अपने लोगों की बातें आगे ले जाएंगे। अपनी हिस्सेदारी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों में बढ़ाएंगे। कई जातियां मिलकर स्वतंत्र दल भी बना सकतीं हैं। जाति आधारित जनगणना से भारतीय समाज से निकलीं सच्चाइयों का सामना देश को करना पड़ेगा। इसमें उन्हें वक्त लग सकता। हां, जो जातियां अब तक पीछे छूट गईं हैं, उन्हें आगे लाया जा सकता है। इसके लिए आयोग गठित करने पड़ेंगे।


1931 में हुई थी जातिगत जनगणना, लेकिन आंकड़े नहीं आए सामने

इतिहासकार सोलंकी त्रिवेणी की मानें तो देश में 1881 में पहली बार जनगणना हुई। तब शिक्षा व रोजगार पर फोकस था। जातिगत जनगणना 1931 में हुई। तब पाकिस्तान व बांग्लादेश भी अपना हिस्सा था। देश की आबादी 30 करोड़ थी। आंकड़ों को संजोया नहीं गया था। इस कारण सही आंकड़े सामने नहीं आए। इसके बाद 1941 में भी जाति आधारित जनगणना हुई। जनगणना के कुछ ही महीनों बाद द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। इस कारण इस बार भी जनगणना प्रकाशित नहीं हुई। जब देश आजाद हुआ तो सरकार ने जाति आधारित जनगणना नहीं कराने का निर्णय किया। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कहा था कि इससे सामाजिक तनाव बढ़ेगा। तब से प्रत्येक जनगणना में केवल अनुसूचित जाति व जनजातियों को शामिल कर उनके आंकड़े प्रकाशित किये जाते हैं। त्रिवेणी के अनुसार 1931 में ओबीसी की आबादी देश में 52 फीसद तक थी।


हर दस वर्ष पर फरवरी महीने में घर-घर सदस्यों की संख्या गिनने पहुंचते हैं शिक्षक

हर दस वर्ष पर फरवरी के एक से 20 तारीख तक हमारे देश में शिक्षक हर घर पहुंचते हैं। वे घर के हर सदस्य को गिनते हैं। उनके बारे में जानकारियां लेते हैं। लंबा-चौड़ा फॉर्म भरते हैं। उसकी एक पर्ची भी देते हैं। अब तक केवल 1941 में दूसरे विश्वयुद्ध के कारण ऐसा नहीं हो पाया था। उस समय आंकड़े इतने विश्वसनीय होते थे कि सरकार उसी आधार पर लोगों के लिए योजनाएं चलाती थीं। 2011 से अलग तरीके से जनगणना शुरू हुई। इसे सोशियो इकॉनोमी एंड कास्ट सेंसस 2011 कहा गया। इस आधार पर 12वीं पंचवर्षीय योजना शुरू होनी थी। 29 जून 2011 से 31 मार्च 2016 तक यह चला। इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। जिस जाति विशेष के लिए यह कराया गया, वह आज भी उसी तरीके से जी रही है।


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Till when will the governments not conduct caste census ?


After all, who are the people in the country who do not want to bring out the truth of castes? Do they belong to Congress or BJP? We don't know. Yes, it is necessary that the figures collected in independent India till the expenditure of five thousand crores were not shown to the country.


People having fun for centuries oppose caste census every time. They fear that if the actual figures come out after the census, then the backwards will be dominated. Only a handful of people who are protesting today have the right to the resources of the country. Governments also support them. Although the Manmohan Singh government had assured to consider it, but the caste census could not be conducted. In our country, caste is asked before giving job, election even house on rent. In such a situation, till when the governments will not conduct the caste census. Many state governments are also demanding caste census. The resolution has already been passed in the Bihar Legislature and Legislative Assembly. Its demand has also been right in the Maharashtra Legislative Assembly. Many political parties in Odisha and UP have also demanded a caste census. In such a situation, the Center is ignoring their words.


Equation of political parties will be strengthened by caste census

Caste dominates the states. People vote for the party of their caste keeping development issues aside. Everything would have been fine till the day before the voting, but everything would have changed on the day of voting. Regional political parties also take advantage of this. If the caste census is done, then the political parties will get a stronger base. So far regional parties have staked claim in elections only on the basis of presumption. Voters in his favor. More often than not she succeeds in this. Voters coming from OBC have more influence in the elections. The Hindutva flag of BJP also runs because of these castes. This is the reason why all the political parties have an eye on the voters of this caste. According to the data, in 2014, voters of this caste openly voted in favor of BJP in the Lok Sabha.


Why caste census is necessary ?

From the caste census, the government can find out how many people belong to which caste. In such a situation, the facilities available to them can also be given. There are many such schemes of the Social Welfare Department, which do not reach the eligible beneficiaries. This amount is wasted. It is being said that this will increase casteism, but has casteism ended from the country till now? The answer would be no. Yes, there may be conflicts in the beginning. Many castes can openly allege that they have been neglected. Such castes are making allegations even without census today. Yes, if the caste census is done, then new leaders will emerge from their society. They will take the words of their people forward. Will increase his stake in mainstream political parties. Several castes can also form independent parties together. The country will have to face the truths emanating from the Indian society through caste based census. It may take them time. Yes, the castes which have been left behind so far can be brought forward. For this a commission has to be set up.


The caste census was done in 1931, but the figures did not come out

According to historian Solanki Triveni, the first census was conducted in the country in 1881. Then the focus was on education and employment. The caste census was conducted in 1931. Then Pakistan and Bangladesh were also their part. The population of the country was 30 crores. The data was not saved. For this reason, the correct figures were not revealed. After this caste based census was also conducted in 1941. A few months after the census, World War II broke out. For this reason the census was not published this time also. When the country became independent, the government decided not to conduct caste based census. The then Home Minister Sardar Vallabhbhai Patel had said that this would increase social tension. Since then, only the Scheduled Castes and Scheduled Tribes are included in each census and their figures are published. According to Triveni, in 1931, the OBC population was up to 52 percent in the country.


Every ten years, in the month of February, teachers reach from house to house to count the number of members.

Every ten years from the 1st to the 20th of February, teachers reach every home in our country. They count every member of the household. Get information about them. Fill out a long form. Give him a slip too. So far this could not happen only in 1941 due to the Second World War. At that time the figures were so reliable that the government used to run schemes for the people on the same basis. Census started in a different way from 2011. It was called Socio Economy and Caste Census 2011. On this basis the 12th Five Year Plan was to be started. It ran from 29 June 2011 to 31 March 2016. It also did not help. The particular caste for which it was done is still living in the same way today.


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