Is Online Education In India led to 'Unequal Schooling'?

Updated: Aug 15

The Global corona virus pandemic has led to crisis in education. Anganbadi and school are closed and children are at home. There is much discussion about learning loss. The government has initiated pedagogical framework - 'Bharat padhe online', e- Vidyalay schemes and strengthens several education projects-digital, online and mass media. In push to move education online, 'unequal schooling' system has evolved. Millions of children's in India do not have more than one smartphone in family. Some have smart phones, but not money to buy expensive net plan.

yesterday, while reporting i found a ground reality of online education Renu, 16 is a student of class 10 in Rajkiya Sarvodaya Vidyalaya in East Delhi. She belongs to Ayodhya UP, living on rent in East Delhi with his 6 family members in one single room. She facing difficulty in online studies, they have only one smart phone in family, which his father takes with him to work. she is brilliant student but lack of technology has forced him to fail.

Online education has again drawn a line between poor and rich. A data shows that over 55 Million workers, who were earning above poverty line income, have lost job temporarily or permanently during this crisis. At present situation it would we correct to say -have all children benefited from online education ?

They do not have ration to eat in times of crisis. Before we focus too much on learning, we need to pay attention to hunger because 'a healthy body is of paramount importance before building a healthy mind'.

UNICEF data showed that one in three children in India has Malnutrition. Several reports said that the mid-day meal scheme was also closed due to the closure of the school. Because of which children are doing garbage picking to fill their stomachs. Most of the children are from Bihar, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Chhattisgarh.

We need to stop panicking about Children's falling behind in some imaginary academic race. We can utilize this time in positive way by reconstructive the syllabus,by focusing on 21st century skills rather than content. All those important things which were not taught earlier due to huge academic curriculum, we can presently teach those thing like- moral education, daily life problems, planting garden, cleaning space, painting wall etc.

It is also time for community action - local communities should support creating learning centers. Educated people, whether they work in any field, can teach children something new every day without class, in this way poor children learn new things. Rabindranath Tagore said that" The best place to learn things is under the sky without four walls", That is why he opened 'Shantiniketan'. Currently, we need to open more Shantiniketas in villages so that children can learn basic knowledge in open environment. Where children are lagging behind due to lack of technology.

Before giving e-education, the government needs to provide proper infrastructure in digital world to enable everyone to engage with technology by Providing smartphone and less expensive data. Then e-education will be successful otherwise, it will only create 'unequal schooling'.

In global pandemic, we all are need to join hands to support each other so that no one stays hungry, no one remains behind.

Government initiatives - 'Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojana' and in Delhi ’Mukhymantri Ghar Ghar Ration Yojana’ are good initiative for poor people in time of starvation. But in field of education need more improvement to stop 'unequal schooling'.

क्या भारत में ऑनलाइन शिक्षा 'असमान स्कूली शिक्षा' का कारण है?


ग्लोबल कोरोना वायरस महामारी के कारण शिक्षा पर संकट आ गया है। आंगनबाड़ी और स्कूल बंद हैं और बच्चे घर पर हैं। सीखने की हानि के बारे में बहुत चर्चा है। सरकार ने शैक्षणिक ढांचे की शुरुआत की है - 'भारत पढ़ें ऑनलाइन', ई-विद्यालय योजनाएं और कई शिक्षा परियोजनाओं को मजबूत बनाया जा रहा है- डिजिटल, ऑनलाइन और मास मीडिया। शिक्षा को ऑनलाइन स्थानांतरित करने से, 'असमान स्कूली शिक्षा' प्रणाली विकसित हुई है। भारत में लाखों बच्चों के पास परिवार में एक से अधिक स्मार्टफोन नहीं हैं। कुछ के पास स्मार्ट फोन हैं, लेकिन महंगा नेट खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं।

कल, मैंने रिपोर्टिंग के दौरान ऑनलाइन शिक्षा की जमीनी हकीकत को पाया, 16 साल की रेनू पूर्वी दिल्ली के राजकीय सर्वोदय विद्यालय में 10 वीं कक्षा की छात्रा है। वह अयोध्या यूपी की रहने वाली है, एक कमरे में अपने 6 परिवार के सदस्यों के साथ पूर्वी दिल्ली में किराए पर रहती है। वह ऑनलाइन पढ़ाई में कठिनाई का सामना कर रही हैं, उनके पास परिवार में केवल एक स्मार्ट फोन है, जिसे उनके पिता काम करने के लिए अपने साथ ले जाते हैं। वह प्रतिभाशाली छात्र है, लेकिन प्रौद्योगिकी की कमी ने उसे विफल मजबूर बना दिया है।

ऑनलाइन शिक्षा ने फिर से गरीब और अमीर के बीच एक रेखा खींच दी है। एक डेटा से पता चलता है कि 55 मिलियन से अधिक श्रमिक, जो गरीबी रेखा से ऊपर की आय अर्जित कर रहे थे, इस संकट के दौरान अस्थायी या स्थायी रूप से नौकरी खो चुके हैं। वर्तमान स्थिति में यह कहना ठीक होगा- ऑनलाइन शिक्षा से सभी बच्चों को फायदा हुआ है?

इस संकट के समय में उनके पास खाने के लिए राशन नहीं है। हमें सीखने पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करने से पहले, भूख पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि 'स्वस्थ दिमाग बनाने से पहले स्वस्थ शरीर सबसे महत्वपूर्ण है'।

यूनिसेफ के आंकड़ों से पता चला कि भारत में तीन बच्चों में से एक कुपोषण है। कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि स्कूल बंद होने के कारण मिड डे मील योजना भी बंद हो गई। जिसके चलते बच्चे अपना पेट भरने के लिए कचरा बीनने का काम कर रहे हैं। जिसमें अधिकतर बच्चे - बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ से है।

हमें काल्पनिक शैक्षणिक दौड़ में बच्चे की पढ़ाई पीछे छूटने के डर कोर ोकने की जरूरत है। हम इस समय का उपयोग सिलेबस को पुनर्संरचना द्वारा सकारात्मक तरीके से कर सकते हैं, सामग्री के बजाय 21 वीं सदी के कौशल पर ध्यान केंद्रित करके। उन सभी महत्वपूर्ण चीजों को जो पहले बड़े शैक्षणिक पाठ्यक्रम के कारण नहीं पढ़ाया जाता था, वह हम वर्तमान में उन चीजों को पढ़ा सकते हैं जैसे, दैनिक जीवन की समस्याओं, रोपण उद्यान, सफाई की जगह, पेंटिंग की दीवार आदि सिखाने के लिए अच्छा समय है।

यह सामुदायिक कार्रवाई का समय भी है - स्थानीय समुदाय सीखने के केंद्र बनाने का समर्थन करना चाहिए शिक्षित लोग चाहे वह किसी भी क्षेत्र में काम करते हो, बिना कक्षा के बिना हर दिन बच्चों को कुछ नया सिखा सकते हैं, इस तरह से गरीब बच्चों को नई चीज सीखने में बहुत मदद मिलेगी। रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा कि "चीजों को सीखने के लिए सबसे अच्छी जगह चार दीवारों के बिना आसमान के नीचे है। इसलिए उन्होंने 'शांतिनिकेतन' खोला था। वर्तमान में, हमें गाँवों में अधिक शांतिनिकेतन खोलने की आवश्यकता है ताकि बच्चे खुले वातावरण में बुनियादी ज्ञान प्राप्त कर सकें। जहां टेक्नोलॉजी की कमी के कारण बच्चे पीछे हैं।

ई-शिक्षा देने से पहले, सरकार को स्मार्टफोन और कम खर्चीला डेटा प्रदान करके प्रत्येक व्यक्ति को प्रौद्योगिकी के साथ जुड़ने के लिए डिजिटल दुनिया में उचित बुनियादी ढांचा प्रदान करने की आवश्यकता है। तब ई-शिक्षा सफल होगी अन्यथा, यह केवल 'असमान स्कूली शिक्षा' का निर्माण करेगा।

वैश्विक महामारी में, हम सभी को एक दूसरे का समर्थन करने के लिए हाथ मिलाने की जरूरत है ताकि कोई भूखा न रहे, कोई भी पीछे न रहे

सरकार की पहल - 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना' और दिल्ली में 'मुख्मंत्री घर घर राशन योजना' भुखमरी के समय में गरीब लोगों के लिए अच्छी पहल है। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में 'असमान स्कूली शिक्षा' को रोकने के लिए और अधिक सुधार की आवश्यकता है।


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