ग़ज़ब मानसिकता है,

मुंबई में मोहब्बत, दिल्ली में लिव इन और 35 टुकड़े... रूह कंपा देगा श्रद्धा के इश्क का अंजाम


किसी लड़की से बात कर लेना, किसी लड़की के दुःख-सुख को जान लेना, उसका स्नेहिल साथ पा जाना, उस लड़की पर कब्जेदारी कैसे हो जाती है। दरअसल, इसकी बुनियाद किशोरावस्था में पड़ती है।

लैंगिक दृष्टि से देखें तो ज्यादातर बालकों की पारिवारिक और सामाजिक परवरिश बहुत दोयम दर्जे की होती है। जहां शुरू से ही लड़के को मजबूत और लड़की को कमजोर मानने का अंतर स्पष्ट दिखने लगता है। अपने-अपने घरों में लोग स्त्रियों के प्रति सम्मान और बराबरी का नैतिक पाठ पढ़ाना ज़रूरी नही समझते और अभिभावक खुद अपनी मां, बहन और पत्नी से बेअदबी करता है। उनके साथ गाली-गलौज करता है।

दूसरी ओर ज्यादातर किशोर लड़कियां अपने घर-परिवार में अपने लिए अनुपस्थित प्रेम और संवाद की तलाश में अपने परिवार से इतर किसी न किसी लड़के के प्रभाव और चपेट में आ ही जाती हैं। जिसका नतीजा यह होता है कि प्रेमी पुरुष, प्रेम में डूबी लड़कियों को बहुत कमजोर, निरीह और भावुक समझकर उसके साथ साजिश रचते हैं। ज्यादातर लड़के, लड़कियों को येन-केन प्रभावित करके लड़कों के समूह में अपने को बहुत काबिल समझते हैं। जबकि लड़कियों को प्रभावित करने की प्रक्रिया में वो किसी भी हद तक चले जाते हैं। या तो पहले लड़की के सामने अपनी घनघोर निष्ठा, समर्पण और उसका ख्याल करने वाला साबित करता है या तो डराने-धमकाने का उपक्रम।

बाद में वही लड़का इतना हैवान निकलता है या इतना घटिया कृत्य करता है कि लड़की बाद में ठगा महसूस करती है। भावनात्मक रूप से इतना टूट जाती है कि अवसाद में चली जाती है। घर-परिवार से उनका नाता टूट जाता है सो अलग।

वैसे भी किशोर उम्र में विपरीत दैहिक आकर्षण को प्रेम कहना ठीक नहीं। अधिकांश लड़के प्रेम का छद्म रचते हैं। उसके पीछे उनकी मंशा जातीय/धार्मिक फतेह की होती है या लड़की के परिवार की संपत्ति पर नज़र या देह भोग की नियति से प्रेरित होती है।

मैंने सैकड़ों कहानियां पढ़ीं हैं और देखी भी है कि किशोर उम्र की लड़कियों को उनके बनावटी प्रेमी या तो लड़की को बेच आते हैं, उनसे धन उगाही करते रहते हैं, धर्म परिवर्तन करा देते हैं या कुछ नहीं तो यौन शोषण के बाद दुत्कार देते हैं और फिर किसी और लड़की को अपने गिरफ्त में लेने को तैयार हो जाते हैं।

प्रेम में डूबी किशोर लड़कियों के अभिभावकों को यह ध्यान देना चाहिए कि कहीं उनकी बच्चियां अपने ही घर में परिवारिक प्रेम से वंचित तो नहीं। उन्हें हर बात में संदेह की निगाह से देखा तो नहीं जा रहा। उनकी हर छोटी-छोटी भूलों को पहाड़ तो नहीं बनाया जा रहा। उन्हें लड़की होने के कारण कोसा तो नहीं जा रहा। लड़की होने के नाते उनके साथ भेदभाव तो नहीं रखा जा रहा। उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को नजरंदाज या उसके लिए उन्हें ताना तो नहीं मारा रहा है। पिता या भाई उसे मारता-पीटता तो नहीं।


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