ऐसी-वैसी लड़कियाँ

Updated: Aug 5

ऐसी-वैसी लड़कियाँ...

पता है इसका मतलब

किसी शब्दकोश में भले ही न हो

लेकिन पूर्वाग्रहों व संदेहों की भाषा में

चढ़ा हुआ है हर आदमी की जबान पर

इस शहर से उस शहर तक

उमगती कोंपलों पर छा जाने वाली राख की तरह

फैला हुआ है इस गली से उस गली तक

ऐसी-वैसी लड़कियाँ

आधुनिकता के कबिलाई पाठ में

सभ्य होने का वहम पाले हुए समाज में

विद्रोही स्वभाव की लड़कियों को

अक्सर दिया जाने वाला तमगा है

ऐसी-वैसी लड़कियाँ

फुसफुसाहट, मंद मुस्कान, कनखियों और संकेतों में

नाट्कीय भंगिमाओं के साथ गोलाकार होते होठों से

माथे पर बनती-बिगड़ती रेखाओं और

तनी हुई भृकुटियों के बीच

धीमी किंतु चिपचिपी-सी आवाज में निकलने वाले वे शब्द है

जो उन लड़कियों को चरित्रहीन साबित करने की

साजिश का हिस्सा होते हैं

जिन्हें हजार तरह के प्रलोभनों के बाद भी

हासिल कर पाने में नाकाम रहने वाले

हर उम्र के पुरुष

यहाँ तक कि आजादी के अर्थ से अनजान

मर्दवादी सोच वाली स्त्रियाँ भी

अपनी-अपनी धारणाओं-कुंठाओं की आड़ में

भरसक किया करते हैं

उनके दरवाजों पर

चोरी से लिख आते हैं-

ऐसी-वैसी लड़कियाँ


चंद्रमा की तिथियों में

अलग-अलग आयु की कन्याओं के

बलात् उपभोग की विधियाँ बताती

आदिम प्रथाओं से असहमति दर्ज कराती

अनधिकार स्पर्श और गोपन इशारों पर

शरमाने-सकुचाने की बजाय

तनकर खड़ी हो जाने वाली

अपेक्षित हाँ को ना कहते हुए

पितृसत्ता को समकोण पर काटने वाली

लड़कियों को

ऐसी-वैसी कहा जाता है

वे जो किसी के प्रेम में डूबी रहती हैं

वे जो दुख में अकेली रहना चाहती हैं

जिन्हें इंतजार होता है किसी का बरसों से

जो अपनी शर्तों पर जीना चाहती हैं

देह के सौंदर्य और शरीर विज्ञान का

अर्थ समझने वाली लड़कियों को भी

गाहे-बगाहे कहा जाता है

ऐसी-वैसी लड़कियाँ

चरित्र प्रमाणपत्र देने की जल्दबाजी में

उन्हें आवारा-उन्मादी-बदचलन बताकर

रोज नए-नए मर्द की तलाश करने वाली

ऐसी-वैसी लड़कियाँ

बता देना

परंपरा बन चुका है


ऐसी-वैसी लड़कियाँ

एक अश्लील लांछन बनाया गया है

आजाद-ख्याल लड़कियों के खिलाफ

जो नहीं रीझती फूलों से अपनी तुलना होने पर

चूड़ी-पाजेब-नथ-कुंडल और गलमाला को

औरत का जरूरी श्रृंगार बताने वाली

सलाहों और समझाइशों पर

लानत भेजा करती हैं

ऐसी-वैसी लड़कियाँ जानती हैं

स्त्री को पूजने वालों की मंशाएँ

आंगन और देहरी के पार बिछी बारूदी सुरंगों को

चिह्नते हुए

गंड़ासे और बंदूक दिखा-दिखाकर

खींची गई लक्ष्मण रेखाओं के पार चली जाती हैं

पुश्तैनी संदूकों में संभालकर रखी

वीर्य-वर्चस्व की कहानियों, जंतरों व चालीसाओं

पुराण-कथाओं के वाग्जाल और

पुत्रवती होने के वरदानों के पीछे छिपी चालाकी को

ऐडियों से कुचल डालने वाली लड़कियों को

कह दिया जाता है

ऐसी-वैसी लड़कियाँ


गठरी की तरह लदी हुई मर्यादाएँ

हाथों में कसकर बाँधी गई शुचिताओं और संयमों की रस्सियाँ

योनि और स्तनों की तारबंदी को काटते हुए

अपने अस्तित्व को मुक्त करती

जिद्दी लड़कियों का रास्ता

उन्हें ऐसी-वैसी लड़कियाँ बताकर ही

रोका जाता है

रोटी-बरतन और सेवा-पानी की परिभाषा से परे

खिड़कियों से बाहर सिर निकालती

तर्कशील और रोमांटिक लड़कियों को

राई से पहाड़ बनता देखकर

गर्भ से ही वंश-वारिसों की छँटनी करने के अभ्यस्त कुलीन

अपने डाँवाडोल सिंहासन पर बैठे हुए

चिल्लाकर कहा करते हैं

ऐसी-वैसी लड़कियाँ


वे अपने खुले हुए केशों में

सजाती हैं बादलों पर बनती आकृतियाँ

चौबारों में खड़े-खड़े मुरझाने की जगह

बाहें फैलाकर दौड जाना चाहती हैं

घनी अमराइयों-खेतों-पहाड़ों-क्षितिज तक

सपने देखने वाली लड़कियों को

खूँटों पर रोके रखने के लिए

लगा करते हैं मजमे

आँखों को सिर के पीछे चिपकाए बैठी

पंचायतें सुनाती हैं मनमाने फैसले और फरमान

कसी जाती हैं फब्तियाँ

उन्हें बेदखल किया जाता है संपत्तियों से

सरेआम निर्वस्त्र किया जाता है

बताया जाता है डायन और कुलटा

लटकाया जाता है पेड़ों और शहतीरों पर

छूरे से भी तेज धार वाली गालियाँ

हर दिशा से छीलती-उघाड़ती रहती हैं

उनके अंग-प्रत्यंगों और अस्मिता को

चेहरों पर फेंके जाते हैं तेजाब

उनकी पहचान को मिटाने के लिए

उन्हें देखकर गुड़गुड़ाया करते हैं हुक्के

जमीन को थूक और पीक से गंदा करते हुए

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष से मुठभेड़ करती लड़कियाँ

तोड़ती रहती हैं अपने मुश्किल घेरे

वे कभी बदनामी के डर से घर में नहीं छिपती

फिर भले ही उन्हें कोई कह देता हो

ऐसी-वैसी लड़कियाँ

Dr. Ashok Kumar Chauhan is a Assistant Professor at Department of Higher Education (M.P) India

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