हिंदुत्व की आँच पर पकता ‘लव जिहाद’ का सियासी कोरमा

Updated: Aug 5


प्रेम व विवाह पर की जाने वाली सांप्रदायिक राजनीतिक दरअसल निजी जिंदगी में सत्ता की दखलंदाजी है, जिसका भरपूर विरोध किया जाना जरूरी है। प्रेम व विवाह में दखल से आगे बढ़कर भविष्य में वह हमारे खान-पान और बेडरूम तक घुस आएगी।


इस देश के लोग धर्म-संस्कृति और परंपराओं के मामले में आज भी बेहद संकुचित दृष्टिवाले और विनाशक पूर्वाग्रहों से घिरे हुए हैं और इसका नतीजा ये निकल रहा है कि उन्हें न तो सही तरीके से जीने का सलीका आ पाया है और न ही प्रेम और विवाह जैसे मसले पर सोच बदलने का। वे अपनी जिंदगी को अय्यारी और प्रपंच से भरी किसी कहानी की तरह जटिल अवसादित और नाखुश बनाए हुए है। कितनी अजीब बात है कि हम सौंदर्य एवं प्रेम में निमग्न रहने वाले महान पूर्वजों की भूमि पर रह रहे हैं। हमने प्रेम में विराट चिंतन को और मिली-जुली संस्कृति के महत्व की विरासत को कहीं गहरे दफन कर दिया है। ऐसे समय में जब प्रेम को राजनीति की विषयवस्तु बनाया जा रहा हो तब हम याद करते हैं उन उपन्यास व कहानियों-नाटकों को जिनकी थीम, प्रेम व विवाह की जद्दोजहद, जोखिम और मुश्किलों को अभिव्यंजित करती आई हैं। नायक का नायिका के प्यार में पड़ना तथा फिर उन दोनों के प्रेम में जाति, धर्म, वर्ग और ऊँच-नीच की मानसिकता की दीवार उठ खड़े होना, फिर विपरीत धर्म के परिवारों में संघर्ष और अंत में मिलाप या विछोह और कुछ में प्रेमियों की हत्या जैसी नृशंसता भी दृश्यांकित होती रही है। चाहे जो हो, अंत में जीत प्रेम की ही दिखाई जाती है। जैसा समाज होता है, वैसी ही कला होती है और वैसी ही अभिव्यक्ति। ठीक इसी तरह धर्म में राजनीति का रंग जितना ज्यादा होगा, अंतर्धार्मिक प्रेम व विवाह पर हाय-तौबा और मीडिया प्रायोजित सनसनी भी उतनी ही ज्यादा होगी।

प्रेम व विवाह पर की जाने वाली सांप्रदायिक राजनीतिक दरअसल निजी जिंदगी में सत्ता की दखलंदाजी है, जिसका भरपूर विरोध किया जाना जरूरी है। प्रेम व विवाह में दखल से आगे बढ़कर भविष्य में वह हमारे खान-पान और बेडरूम तक घुस आएगी। भारतीय समाज में प्रेम संबंध या शादियाँ सरकस के किसी तूफानी करतब की तरह बना दी गई हैं। प्रेम विवाह का विरोध इसलिए भी होता है क्योंकि उससे बाजार और धर्म के ठेकेदारों का पुश्तैनी धंधा चौपट होने का डर होता है। चूंकि भारतीय समाज की एक बड़ी कुंठा इश्क-मुहब्बत भी है। प्रेम व यौन संबंधों की अतृप्त कुंठा को हिंदी फिल्मों ने बहुत अरसे तक भुनाया भी है। हालांकि अपने कलात्मक एवं रंगमंचीय एथिक्स के चलते जैसा कि हम सब जानते हैं, सिनेमा में अंतर्वर्गीय, अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय प्रेम एवं विवाह की भी खूब वकालत हुई है। अलग अलग धर्म वाले नायिका-नायक के आदर्श प्रेम के आख्यान रचे गए हैं। हर धर्म जाति के दर्शकों ने आवेश और खुशी के कारण ऐसी सिनेमाई कहानियों पर तालियाँ भी खूब बजाई हैं। साहित्य व सिनेमा में आँसुओं और भावुकताओं का प्रभावी उदात्तीकरण किया गया है। कला माध्यमों द्वारा भारत के कुंठित समाज के अनगिणत कल्मषों का विरेचन करने की कोशिशें की गई लेकिन इनसानियत की दुहाई के साथ नागरिक जागरूकता के बावजूद धर्म के मोटे और लीक प्रूफ दरवाजे में खुद को बंद किए बैठी ताकतों ने अपने धार्मिक जातीय पूर्वाग्रहों को जरा भी दूर करने का प्रयत्न नहीं किया है।

अपने धर्म से बाहर अन्य धर्म के व्यक्ति से प्रेम या विवाह को लेकर जितना चौकन्नापन-चिड़चिड़ापन भारत के तथाकथित सनातनी समाज में हैं ऐसा शायद ही कहीं और किसी धर्म में हो। जाहिर है भारतीय समाज विशेषकर सवर्ण हिंदुओं में अपने धर्म से इतर ईसाई, मुस्लिम या अन्य धर्म समुदायों में प्रेम व विवाह के प्रति स्वीकार्यताएँ बहुत कम हैं, न के बराबर। फिर चाहे कोई परिवार कितना भी पढ़ा-लिखा या संपन्न हो। संकीर्ण सोच के लोगों द्वारा मध्यकाल की बहुत तारीफ तो की जाती है लेकिन मध्यकाल के समाज सुधारक संतों-सूफियों के उपदेशों का कोई प्रभाव हिंदुओं पर नहीं पड़ा है। महापुरुषों के मानव मात्र में प्रेम व भ्रातृभाव के लिए कही गई तमाम सुभाषित एवं सूक्तियाँ परंपरावादी जड़तावादी समुदायों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पायी हैं। कबीर, रैदास, रसखान और रहीम आदि के दोहों की गंगा-जमुनी विरासत किताबों में तो खूब महिमामंडित पल्लवित होती रही है लेकिन व्यवहार में उसका प्रयोग सिरे से खारिज कर दिया जाता है। मुस्लिमों का संकीर्ण दिमाग वाला एक धड़ा तो अभी भी मध्यकाल के सफर से वापस लौटने को तैयार ही नहीं है।

ये तो एक अलग कोण हुआ लव जिहाद जैसे मीडियाई शोर का। लव जिहाद सामाजिक नहीं, बल्कि एक विशुद्ध धार्मिक-राजनीतिक एजेंडा है। सत्ता के हाथों बिक चुकी मीडिया इसे जमकर हवा दे रही है। बहुत से नासमझ ये भ्रम पाल बैठे हैं कि लव जिहाद केवल दो धर्मों के लड़का-लड़की के प्रेम व शादी-ब्याह का मसला है। जाहिर है ऐसा बिल्कुल भी नहीं हैं। असल में धर्म का पाखंड, पितृसत्तात्मक सोच और अंध-धार्मिकता, कई समस्याओं का स्रोत हुआ करती है और इस मामले में भी यही बात लागू है। वस्तुत: ‘लव जिहाद’ जैसे मामले को इश्क़ या शादी के फ्रेम से थोड़ा और ज़ूम करके देखना ही मुनासिब होगा और इस विषय में छिपी राजनीतिक सनातनी मंशाओं व षड्यंत्रों की गंभीरता तथा वास्तविकता समझ में आ सकेगी। मेरे हिसाब से, जैसा कि एक सामान्य सोच हुआ करती है, हिंदू और मुस्लिम में परस्पर इश्क या शादी किसी भी कोण से समाज विरोधी या संस्कृति विरोधी नहीं। प्रेम व शादी को किसी भी धर्म का विरोधी या समर्थक होने का सवाल ही नहीं उठता। आखिर दो कौड़ी के पुरोहितों-पंडों, राजनेताओं और सत्ताखोर धर्मोन्मादियों को शादी, प्रेम या रिश्तों के मामले में टाँग अड़ाने के लिए किसने लंबरदार बना दिया? लड़का-लड़की राजी तो क्या करेगा मोदी-योगी या काजी।

जब प्रेम को धार्मिक कूढ़मगजी और कट्टरता का हथियार बनाया जाने लगे तो बात गंभीर हो जाती है, विचारणीय हो जाती है। इसे हम ‘लव जिहाद’ की जगह ‘लव के खिलाफ फासीवादी सत्ता का क्राइम’ कहें तो सही होगा। लव जिहाद और उससे जुड़े तमाम पहलुओं का एक पक्ष यह भी है कि धार्मिक और सामाजिक समस्या के रूप में इसे काफी प्रचार हासिल हो चुका है। यह समस्या अब और ज्यादा अंतर्विरोधात्मक है। हिंदुवादी संगठनों की माने तो ये मामला चूंकि गैरधर्म की लड़की पर डोरे डालने, नाम बदलकर प्रेम जाल में फँसाने, धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने तथा हिंदू लड़की पर कब्जा करने जैसी बेस लाइनों यानि नारों पर टिका है। ये संगठन इस विषय पर देश के न्यायिक व संवैधानिक तंत्र पर भी भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। लव जिहाद एक संगठन विशेष की जहरीली साजिश से प्रचारित शब्द है और इसके पीछे की मंशा को किसी गहरी पड़ताल की जरूरत नहीं है। इसके रेशे और रसायन कुछ हद तक देश की एकता, समरसता और हिंदू-मुस्लिम बंधुत्व की मजबूत चट्टानों को दरकाने जैसी स्थिति से जुड़े हुए हैं। उसका इस्तेमाल कुछ संगठन मुसलमानों के खिलाफ नफरत का माहौल पैदा करने में कर रहे हों।

मोदी युग में मीडिया एक संदेहास्पद जनसंचार माध्यम बन गया है। सत्येतर अवधारणाओं तथा फेक न्यूज की आँधी में मीडिया की विश्वसनीयता, जन सेविता और तथ्यात्मक अब सिरे से गायब होती जा रही है। भारतीय समाज की मनोदशाओं को देखते हुए इस मसले का पूरा उपचार किया जाना जरूरी है। हमें पता होना चाहिए कि धर्म की ख्वाबगाह में माथा टिकाकर बैठी हुई आज के दौर की हिंसक मनोवृत्ति और सांप्रदायिकता की आँखें बहुत चमकदार हो जाया करती हैं। राजनीतिक से पैसे व पोषण पा रहा धार्मिक नफरत का पहलवान और ज्यादा बलिष्ठ व उग्र हो गया है। इसलिए लव जिहाद नाम का यह भ्रामक नारा सही तहकीकात और पारदर्शिता की माँग करता है। लव जिहाद प्रेम से जुड़ी समस्या नहीं है बल्कि यह धर्म और राजनीति के दूषित गठजोड़ से उपजी, एक संगठन विशेष की अंदरूनी कुंठा से कल्पित-प्रचारित एक विराट आडंबर मात्र है क्योंकि खुले तौर पर अपना मुँह दिखाने का साहस संगठन विशेष के धार्मिक बहुरूपियों ने नहीं होता है। लव जिहाद जैसे नारे को फासीवादी सत्ता की प्रचंड जालसाजी के रूप में देखा जाना जरूरी है।

लोग अक्सर झूठी खबरों और सूचनाओं से अपनी सोच को दिशा देने लगते हैं, बगैर उनके स्रोतों की प्रामाणिकता की जाँच किए। इसका परिणाम यह होता है कि सत्ता का अंधसमर्थक बहकावों के ढोल पर कलंदर बना झूमता रहता है और दूसरे व्यक्ति को भी उसी स्तर पर उतार लाने की कवायद में जुट जाता है। वैसे ये कल्पना नहीं है कि विश्व के अन्य देशों में लोग अपने दिमाग से सोचते हैं और राजनीतिक सामाजिक-सांस्कृतिक समझ बढ़ाने के लिए संदर्भों के साथ समाचार-सूचनाओं का विश्लेषण करते हैं, सूचनाओं का अर्थ ग्रहण करते हैं लेकिन अन्य देशों के विपरीत भारत के लोग अख़बार और मीडिया की ख़बरों-सूचनाओं को आँख मूँदकर पढ़ते हैं और उन्हें बिना किसी तर्क के, चाहे वह जिस तरह का हो, प्रसाद समझकर निगल लेते हैं। इस बात को दूसरी तरह कहें तो ऐसे दौर में जबकि सूचनाओं के मीठे फलों पर राजसत्ता और धर्मसत्ता की दूषित परत चढ़ाई जाने लगी हैं तब उन्हें विवेक और विश्वनीयता के साबुन से धोकर ही ग्रहण करना मुनासिब होगा अन्यथा वे नुकसानदेह सिद्ध होती है।

सत्ता अगर एक दिन में बड़े से बड़े फैसले करके लोगों को दिशा निर्देशित करती है तो फिर लव जिहाद जैसे मुद्दे पर आँख मिचौली क्यों चल रही है। लोकतंत्र में ऊपरी तौर पर संवैधानिक प्रणाली लागू होने का भ्रम पैदा किया जाता है लेकिन लोकतंत्र की समझ भी यहाँ के समाजों में नहीं है। इतिहास से वर्तमान तक की स्थिति का जायजा लेते हुए कहा जाए तो कमोबेश भारतीय समाज की नैतिकता के मानदंड राजशाही की कलम और सिपहसालारों की बंदूकों से “स्क्रिप्टिड और गाइडेड” रहे हैं। आमजन के अंधविश्वासी होने में धर्मग्रंथों की भूमिका को भी प्रभावी कारक के रूप में देखा जा सकता है। धर्म के चालाक कारोबारी, फिर वे चाहे मुसलमान हो या हिंदू, एक औसत समझ के व्यक्ति की ही नहीं, पढ़े-लिखे व्यक्ति की भी देखने-सुनने और विचारने की काबिलियत को नष्ट कर देते हैं। धर्म-ग्रंथों का युग और संदर्भ सापेक्ष पाठ होना भी बड़ी जरूरी बात है लेकिन लोग धर्म की किताबों को ईश्वर का लिखा मानकर चलते हैं और सदियों पुरानी मान्यताओं के ताबीज़ और टोटके धारण करते जाते हैं। धर्म की धातु से बने विराट कारागार में तर्क और चिंतन बंधक बना लिए जाते हैं। धर्मांधता की प्रवृत्ति ने पूरी दुनिया में संस्थागत धर्मों को मानव विरोधी और बाजार की शक्ति में तब्दील कर दिया है।

निजी हितों की गठरी को ढोते हुए डर के सायों में जीने वाले समाज में राज-सत्ता ही जनता को उँगली पकड़कर चलाने लग जाती है। हालांकि कुछ किताबों में तो यह भी लिखा गया है कि साहित्य की मशाल समाज को रास्ता दिखाती है। बाजार की चौंध से अंधा हुआ वर्तमान समाज साहित्य से नहीं, पैसे और पॉवर की मशाल से रास्ता खोजता है। पैसा और पैसे वाले ही उसके नवआदर्श और नवप्रेरक बन जाते हैं। भारतीय जनमानस के हृदय में ईश्वर नहीं, बल्कि राजभवनों और सेनापतियों की अदृश्य तलवारों का भय निवास करता आया है।

लव जिहाद के केंद्र बिंदु को तलाशकर इस प्रकरण को संजीदगी से निवारा जा सकता है। लव जिहाद का कांसेप्ट धर्म विशेष के प्रसार और ज्यादा से ज्यादा समर्थक बनाने पर टिकी है। मुस्लिम कट्टरपंथी जिंदगी के सवालों से जूझने की जगह धर्म की बिसात बिछाने में उलझे हुए हैं। सवाल ये है कि लव जिहाद जैसी समस्याओं का उदगम कहाँ से होता है? धर्म के मामले में खुद को बेहतर और संजीदा समझ लेने के भ्रम में लोग अपनी अज्ञानता को दूर करने की मेथेड़ोलॉजी भूल जाते हैं और उन्हें याद रहती हैं सिर्फ अज्ञानता का प्रसाद बाँटने और अफवाहों का भोजन जिमाने वाली तिकड़म। अवैध कमाई का अनुपात दानी-कल्याणी सेठों को और बड़े नकली रहनुमाओं को पैदा करता है। अवाम खुश होकर झोली फैलाता है और रईस को मसीहा होने की गलतफहमी होने लगती है। आज के दौर में अंधविश्वास के लड्डुओं की लुभानेवाली पंगतों का आयोजन सत्ता और धर्म के कुशल कारीगर खूब करने लगे हैं।

लव जिहाद और उसका सामाजिक-धार्मिक प्रोपोगेंडा तथा उसकी वस्तुस्थिति के लिए तथाकथित महंतों द्वारा प्रायोजित राजनीति, धन एवं पद की छड़ी से अपहृत-सम्मोहित मीडिया से इतर कुछ अलग कोणों से देखना भी जरूरी हो जाता है। धार्मिक अतिवाद के चलते लव जिहाद का प्रचलित अर्थ गैरमुस्लिम विशेषकर हिंदू लड़की को बहलाना-रिझाना, प्रेम में फँसाना तथा शादी के बाद इस्लाम धर्म स्वीकार करने को बाध्य करना है। हालांकि आज के तकनीकी और विज्ञान सम्मत दौर में जिहाद का परंपरागत अर्थ किसी काम का नहीं है। पूँजी बाजार पर आधारित जीवन-शैली और रोजी-रोटी के संकट के दौर में कौन किसके खिलाफ धर्म युद्ध करने को उद्यत है, यह तो दुनियावी सरोकारों से महरूम पंडित या मौलवी ही समझ सकते हैं। धर्म के व्यापारी नहीं जानते कि इनसान के लिए मुख्य जरूरत भोजन और बेहतर स्वास्थ्य है। रोजगार और अनाज न हो तो पेट की परिधि धर्म की सारी फिलासफी को अपने अंदर समाहित लेती है। एक मजदूर की चिंता उसके परिवार का गुजारा ही होता है, न कि इमाम के काल्पनिक भय के फतवे। इस युग में धर्मसत्ता की स्थापना का स्वप्न देखना और उसके लिए समर्पित होना एक मानसिक रोग ही माना जाना चाहिए। लव में भी जिहाद का जहर भरने लगना निहायत ही आपराधिक सोच का प्रतीक है।

सच कहें तो प्रेम की जो अवस्था है उसमें कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक फ्रेम में फिट हो ही नहीं सकता। अगर जाति, वर्ग, धर्म जैसी शर्तों की जंजीरें बिछा दी जाएँगी तो प्रेम की निर्द्वद्व संगीत लहरी उत्पन्न होगी ही नहीं। प्रेम की लहर तो धर्म के सारे ‘बैरीकेड्स’ को बहा ले जाती है। प्रेम में पड़ने के बाद बंधनों की स्थिति शून्य और अर्थहीन लगने लगती है बशर्तें कि वाकई कोई सही अर्थ में गहरे प्रेम में हो। किसी धार्मिक मिशन के चलते और धूर्त उद्देश्य के लिए अपने से गैरधर्म की लड़की से प्यार की नौटंकी करना और धोखा देना धर्म का सबाब नहीं, बल्कि अपराध माना जाना चाहिए।

लव जिहाद जैसी समस्या के कुछ और भी आयाम हैं जिनको समझा जाना जरूरी है। देखा जाए तो यह समस्या नहीं है लेकिन जब बात धर्म के प्रसार, पूर्वाग्रहों और राजनीतिक उद्देश्यों से जुड़ी हो तो यह विषय गंभीर हो जाता है। वैसे बिना संकोच के कहा जा सकता है कि हर धर्म-समुदायों में ‘लव’ से दिक्कत होती है। यहाँ व्यक्ति को प्रेम और रोमांस के लिए बहुत सरलता से आजादी एवं स्पेस कहाँ उपलब्ध होता है? प्रेम या लव के विषय में यहाँ के लोग बेहद दकियानूसी हैं। बड़ी बातें तो क्या कही जाए यहाँ तो लड़का-लड़की की दोस्ती को ही सहजता से लिया ही नहीं जाता। बड़े शहरों में चूँकि अजनबियत का माहौल होता है इसलिए वहाँ इस मामले में दूसरे लोग कम दख़लंदाजी करते हैं अन्यथा छोटे कस्बों और गाँवों में क्या स्थिति हैं, यह लिखने-बताने की जरूरत नहीं।

बंदिशों वाले समाज में प्रेम की स्वीकार्यता नहीं होगी तो उस स्थिति में लड़की अपने प्रेम संबंध को माता-पिता या परिवार में बताने से संकोच करेगी जिससे धार्मिक या व्यक्तिगत प्रेम अपराधों को शह मिलने की संभावना बढ़ती ही जाएगी। हम अगर प्रेम और शादी के मामले में समाज को जाति और वर्ग की दीवारें तोड़ने को प्रेरित करें तो ‘लव जिहाद’ जैसे निहायत ‘फर्जी राजनीतिक प्रोपोगैंडा’ को फैलने की स्थिति पैदा ही नहीं होगी। लव से होने वाली शादी में अगर पूरा परिवार और रिश्तेदार अपनी सार्थक और प्रभावी भूमिका में आएँ तथा दोनों परिवारों के बीच रिश्तों के सामंजस्य की धारा बहे तब लड़की के धर्म परिवर्तन के बाद भी कोई अप्रिय स्थिति शायद ही निर्मित हो। लड़की के जबरिया धर्मांतरण, जुल्म और दुर्व्यवहार की स्थिति में कानूनी प्रावधानों के हिसाब के एक्शन लिया जाना चाहिए।

असल में समस्या हिंदू या मुस्लिम का आपसी प्रेम संबंध नहीं है, समस्या धर्म के पाखंड और अज्ञानता से प्रेम जैसी स्थिति को सियासी शतरंज की बिसात बनाने से है। राजनीति की देगची में वैमनस्यता के पुलाव खदकते रहते हैं। हिंदू-मुस्लिम के परस्पर प्रेम विवाह को ‘लव जिहाद’ घोषित करना ही सांप्रदायिक सोच है। अंतर्धार्मिक प्रेम व विवाह करने वाले युवाओं को संदेह के चश्मे से देखना मानवाधिकार का हनन है। हिंदू या मुस्लिम किसी भी धर्म का युवा अगर केवल देह सुख के इरादे से प्रेम करने का ढोंग करता है तो उन्हें लड़की की अस्मिता और गरिमा को ठेस पहुँचाने के अपराध से रूबरू कराना चाहिए। उन्हें इस अपराध का हश्र समझाना होगा कि लड़की का अस्तित्व कोई धार्मिक जलसे का नगाड़ा नहीं है। इस तरह के अपराध में कड़ी एवं तत्काल सजा का प्रावधान हो। अब समय बदल चुका है। ये मध्यकाल नहीं है, समाज को भी इस बात से वाकिफ हो जाना चाहिए कि लड़कियाँ अब युद्ध में जीती हुई कमोडिटी यानि माल-असबाब नहीं है बल्कि मानव सृष्टि का अभिन्न अंग है, समाज में आधारभूत भागीदार है तथा बौद्धिक शक्ति है। प्रेम पर पहरे का एक अन्य पहलू यह है कि परंपरा की जड़ता व प्राचीन श्रेष्ठता की गलत व्याख्या समाज में प्रेम के लिए ‘स्पेस एवं फ्रीडम’ (स्थान एवं स्वतंत्रता) न होने का फायदा होटल और बाजार संस्कृति ने बहुत उठाया है क्योंकि वे प्रेमी जोड़ों को मिलने के लिए प्राइवेसी औऱ सुरक्षा मुहैया कराते हैं।

भयावह धर्मांधता के चलते बरास्ते इश्क़ राजनीतिक एजेंडे को पूरा करना आपराधिक सोच से ज्यादा कुछ नहीं। ‘लव’ या ‘इश्क’ जैसे तरन्नुमी एहसास के साथ गैरवाजिब और गैरमुनासिब ‘जिहाद’ शब्द जोड़ना ही प्रेम और समर्पण के पाकीज़ा एहसास की बेइज्जती है। समाज और दुनिया कितनी भी आगे बढ़ती चली जाए हिंदू समाज धर्मग्रंथों की अवैज्ञानिक बातों की ममियों की तरह अपने जेहन में संरक्षित किए हुए है और प्रेम और उसकी समझ व संवेदना से बहुत बहुत दूर होता जा रहा है।

मेरी राय में लव जिहाद का एक बड़ा पहलू उसका किसी वास्तविक घटना से ज्यादा एक सनसनीपरक सूचना होना है, ख़बर होना है। मीडिया के पंच लाइन इंप्रेशन के इस दौर में बड़ी से बड़ी घटना की भी अब इतनी वैल्यू नहीं होती है जितनी उसकी सूचना की, उसके प्रेजेंटेशन की, वह इसलिए क्योंकि सूचना से मुनाफ़ा हासिल होता है, प्रचार होता है, सत्ता से नजदीकी बढ़ती है। घटना की कोई न कोई सच्चाई और वजह होती है जबकि सूचना का सच और उसकी वजह का कोई ठौर-ठिकाना होना जरूरी नहीं होता। कोरी अफवाहों को भी अब सूचना का प्रमाणपत्र देकर प्रसारित कर दिया जाता है। बहुत से स्तरों पर मीडिया अब जनसंचार एवं ज्ञान का साधन नहीं, बल्कि अंधविश्वास की जड़ी-बूटियों का काढ़ा बन चुकी है। हमें समझना होगा कि घटना से सूचना बनने तक के चरण में कई रंग-बिरंगे रसायन मिल चुके होते हैं। जितना अपमिश्रण होगा सूचना का स्वाद उतना ही चटपटा और जायकेदार लगेगा। मिठास अंदर के ठोस गूदे में नहीं बल्कि ऊपर के लेप में बताई जाने लगी है। अब भी देश के लाखों हिंदू परिवारों के लिए ‘लव जिहाद’ उनके द्वारा सिर्फ पढ़ी हुई सूचना, इश्तहार या बतकही मात्र ही है क्योंकि लव जिहाद जैसा कोई प्रकरण उनके आसपास कहीं भी घटित हुआ नहीं होता है। फेक न्यूज का जमाना है। झूठ ही राजनीतिक सफलता की सीढ़ी बन चुका है। धर्म और सत्ता के कारोबारियों को पता होता है कि घटना तो कुछ ही दिनों तक या एकाध महीने ही असर करती है जबकि सूचना का दोहन लंबे समय तक किया जा सकता है।

लव जिहाद को धार्मिक संगठनों ने अपनी दुकानदारी का सामान बना लिया है। चलो सोचकर बताइए कि भारत जैसे देश की इतनी विकराल आबादी में आपके आसपास लव जिहाद के कितने प्रकरण हुए थे या हो रहे हैं। गौरतलब ये भी कि घटित होने वाले हर अर्तर्धार्मिक प्रेम-संबंध में सभी तो लव जिहाद जैसी आपराधिक सोच पर आधारित नहीं होते हैं। फिर भी किसी एक प्रकरण के आधार पर अब तक हुए सभी अंतर्धामिक विवाहों को इस्लाम के विस्तार से जोड़कर देखा जाने लगता है। यहाँ तक कि भारतीय सिनेमा के फिल्मी सितारों के प्रेम विवाह और राजनीति के कुछ बड़े चेहरों के प्रेम विवाह पर भी लव जिहाद का लेबल लगाया जाने लगा है जो निहायत ही बचकानापन है। एक बात ये भी लव जिहाद के मामले में धर्म के झंडाबरदार दलीलें तो ऐसी देते हैं मानों हर हिंदू लड़कियाँ बिना दिमाग लगाएँ और बिना आगा-पीछा सोचे ही मुस्लिम लड़कों पर रीझ उठती हैं, उनकी दीवानी हुई रहती हैं। माना कि युवावय प्रेम बेहद भावुक और विवेकहीन होता है लेकिन तब भी इस तरह के प्रकरण शादी तक बहुत कम ही पहुँच पाते हैं। यहाँ तो माता-पिता अपने ही समाज या धर्म के लड़के से शादी की हामी आसानी से नहीं भरते हैं गैरधार्मिक लड़के से विवाह की स्थिति तो बहुत बड़ी बात है।

हिंदूस्तान टाइम्स दैनिक में 12 सितंबर, 2013 को छपे हुए एक समाचार के हवाले से बात की जाए। इस समाचार में पितृसत्ता और सामंतवादी मूल्यों पर टिकी पतनोन्मुख धारणाओं के पैरोकार विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल ने ‘बहू, बेटी और इज्जत बचाओ’ आंदोलन करने की बात कही थी। देश और समाज में हो रहे परिवर्तनों के संबंध में बेहद संकीर्ण दृष्टि रखने वाले इस तरह के बहुत से व्यक्ति अपने हिंदू धर्म में बहू-बेटियों पर होने वाली हिंसा और उत्पीड़न के विरूद्ध कोई बड़ा अभियान चलाने की जगह केवल मुस्लिम लड़कों द्वारा हिंदू लड़कियों से प्यार करने जैसी बहुत व्यक्तिगत स्थिति को भी राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि प्रगतिशील समाज इस तरह की बचकानी बातों को सिरे से खारिज करता आया है लेकिन तब भी सांप्रदायिक ताकतें किसी न किसी तरह अपनी सनक से हिंदू एवं मुसलमानों को संक्रमित करने के निरंतर प्रयास करती रही हैं।

लव जिहाद को खास तरह के धार्मिक रंगों से सजाए इश्तहारों की बजाय वास्तविक धरातल पर समझा जाना बेहतर होगा। स्कूल और कॉलेजों की बात हो या आम जन-जीवन में हिंदू-मुसलमान दोनों ही समुदायों के युवाओं में परस्पर दोस्ती और प्रेम हुआ करता है। यह कोई हैरत वाली बात नहीं और जब-तब शादियाँ भी होती हैं। लेकिन जब से धर्म की राजनीति में माल-मुनाफ़े और सनसनी का अनुपात बढ़ा है तब से अंतर्धार्मिक प्रेम व विवाह का मुद्दा कुछ ज्यादा ही उत्तेजनापरक व मुनाफेदार बनता जा रहा है। दूसरी तरफ़ देश में आधिकारिक तौर पर लव जिहाद जैसे भ्रामक झूठ को सही तरीके से खारिज नहीं किया गया है। सत्ता के एजेंडे के पहाड़ के नीचे सच के बड़े बड़े ऊँट भी दबा दिए जाते हैं। ध्यान देने योग्य दूसरा बिंदू ये भी कि भुखमरी, बेरोजगारी, बिगड़ती स्वास्थ्य सुविधाएँ, जल संकट और भयावह प्रदूषण जैसे व्यापक ख़तरों की जगह अनेक सत्ता संचालित संगठन केवल लव जिहाद को देश के ख़तरे के रूप में विज्ञापित कर रहे हैं। जाहिर है हमारी प्राथमिकताएँ बड़ी समस्या को पहले निपटाने की होनी चाहिए। धरती और जीवन के मुद्दे, रोजी-रोटी और रोजगार जैसी जटिल चुनौतियों को पहले सुलझाया जाए तो दूसरी समस्या अपने आप कम हो सकती हैं। भारत के युवा रोजगार और रोटी और स्वास्थ्य के लिए सरकार से सवाल करने लगेगी तो लव जिहाद का झूठ छूमंतर होने में वक्त नहीं लगेगा।


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The politics of ' love Jihad' cooks on the heat of Hindutva


People of this country are still surrounded by very narrow-minded and destructive prejudices in the matter of religion, culture and traditions and the result is that they have neither got the right to live properly nor the love and marriage Like changing the mind on the issue. He lives his life like a story full of Iyeri and Prapancha, complicated depressed and unhappy. What a strange thing that we are living on the land of great ancestors who are immersed in beauty and love. We have buried the legacy of great contemplation in love and the importance of mixed culture. At a time when love is being made the theme of politics, then we remember those novels and stories-dramas whose themes have been expressing the struggles, risks and difficulties of love and marriage. The hero falls in love with the heroine and then in the love of both of them rises the wall of caste, religion, class and high-mindedness, then conflicts in families of opposite religion and finally reconciliation or separation and killing of lovers in some The same brutality has also been pointed out. Whatever it may be, victory is shown to be love in the end. As society exists, so is art and so is expression. In the same way, the higher the color of politics in religion, the higher the inter-religious love and marriage and the more media-sponsored sensation.

The communal politics on love and marriage is actually an interference of power in private life, which needs to be strongly opposed. Going beyond interfering in love and marriage, in future she will enter our food and bedroom. In Indian society, love affairs or marriages have been made like a storm of a circus. There is also opposition to love marriage because it is afraid of collapsing the ancestral business of the contractors of the market and religion. Since there is also a big frustration of Indian society. Unrequited frustrations of love and sexual relations have been redeemed for a long time by Hindi films. However, because of its artistic and theatrical ethics, as we all know, there is a lot of advocacy of inter-class, inter-religious and inter-caste love and marriage in cinema. Narratives of the ideal love of heroines and heroes of different religions have been composed. Audiences of every religion caste have also played applause on such cinematic stories due to the excitement and happiness. Tears and emotions have been effectively sublimated in literature and cinema. Efforts were made by art mediums to unlearn the uncultivated cults of India's downtrodden society, but in spite of civic awareness with insistence on human rights, the forces seated in the thick and leak-proof doors of religion, even a little, removed their religious ethnic prejudices. Haven't tried to do it.

There is hardly any religion anywhere in India that is so much in the so-called Sanatani society about the love or marriage of a person of other religion outside of their religion. It is evident that in Indian society, especially upper caste Hindus, there is very little acceptance of love and marriage in Christian, Muslim or other religious communities other than their religion. No matter how much a family is educated or accomplished. The medieval is highly praised by the people of narrow thinking, but the teachings of the medieval social reformer saints-Sufis have no effect on the Hindus. All the well-known and famous statements of the great men for the love and fraternity of the great men have not left any impact on the traditionalist fundamentalist communities. The Ganga-Jamuni heritage of the couplets of Kabir, Raidas, Rasakhan and Rahim etc. has been greatly glorified in the books, but in practice its use is rejected outright. A section of Muslims with narrow minds is still not ready to return from the medieval journey.

This is a different angle of media jokes like love jihad. Love jihad is not a social, but a purely religious-political agenda. Sold out of power, the media is giving it a strong air. Many mindless people believe that love jihad is only a matter of love and marriage between boys and girls of two religions. Obviously, this is not the case at all. In fact, the hypocrisy of religion, patriarchal thinking and blind religiosity are the source of many problems and the same is true in this case. In fact, it would be appropriate to see a case like 'Love Jihad' zooming slightly beyond the frame of Ishq or marriage and one can understand the seriousness and reality of the hidden political conspiracies and conspiracies. According to me, as is the general thinking, love and marriage between Hindus and Muslims is not anti-social or anti-culture from any angle. There is no question of love and marriage being against any opponent or supporter of any religion. After all, who made two Kauri priests, pandas, politicians and powerful religious leaders to put a leg in terms of marriage, love or relationships? What will a boy-girl agree, Modi-Yogi or Kazi.

When love is made a weapon of religious humiliation and bigotry, then the matter becomes serious, it becomes critical. If we call this the 'crime of fascist power against love' instead of 'love jihad', it would be correct. One aspect of love jihad and all aspects related to it is that it has received much publicity as a religious and social problem. This problem is now even more contradictory. According to Hinduist organizations, this case is based on the slogan base lines like slapping a girl of non-religion, renaming them into a love trap, forcing them to convert, and capturing Hindu girl. These organizations are also not willing to trust the judicial and constitutional system of the country on this subject. Love jihad is a word propagated by the poisonous conspiracy of a particular organization and the motive behind it does not require any deep investigation. Its fibers and chemicals are to some extent associated with the situation of the unity, harmony of the country and the cracking of the strong rocks of Hindu-Muslim fraternity. Some organizations are using it to create hatred against Muslims.

Media has become a questionable mass media medium in the Modi era. The media's credibility, public service and factualism are now vanishing in the face of non-Satyan concepts and fake news. In view of the moods of Indian society, this issue needs to be fully treated. We should know that sitting in the forehead of religion, the eyes of the violent attitude and communalism of today are very bright. The wrestler of religious hatred, who is getting money and nutrition from political, has become more strong and fierce. Therefore, this misleading slogan called Love Jihad demands proper investigation and transparency. Love jihad is not a problem related to love, rather it is merely a grandiose propaganda conceived by the internal frustration of a particular organization, arising from the corrupt nexus of religion and politics, because the courage to show one's face openly is not the religious polymorphism of the particular organization. it happens. It is important to see slogans like Love Jihad as a severe forgery of fascist power.

People often start directing their thinking with false news and information, without checking the authenticity of their sources. The result of this is that the superfluous of power keeps swinging on the drums of the infidels and indulges in the exercise of bringing down the other person at the same level. By the way, it is not imagined that people in other countries of the world think with their minds and analyze news information with references to gain political socio-cultural understanding, take the meaning of information but unlike other countries of India People read the news and information of the newspaper and media blindly and swallow them without any reasoning, whatever kind it is, as Prasad. To put it another way, at a time when the sweet fruits of information have started getting contaminated layer of state and religion, then it will be appropriate to wash them only with the soap of conscience and credibility, otherwise they prove to be harmful.

If power directs people to take big decisions in a day, then why is the eye going on an issue like Love Jihad. The illusion of applying the constitutional system on the upper side is created in democracy, but the understanding of democracy is not even in the societies here. Taking a review of the situation from history to the present, the norms of morality of Indian society have been "scripted and guided" by the pen of the monarchy and the guns of the warlords. The role of the scriptures can also be seen as an effective factor in the superstition of the common man. Clever businessmen of religion, whether they are Muslims or Hindus, destroy not only a person of average understanding, but also the ability of a educated person to see and hear. It is also important for religious texts to be an era and reference relative text, but people consider the books of religion to be written by God and carry amulets and pieces of centuries old beliefs. Logic and contemplation are held hostage in a vast prison made of the metal of religion. The tendency of bigotry has transformed institutional religions all over the world into anti-human and market forces.

In the society that lives under the shadow of fear, while ruling the bundle of personal interests, the government starts to hold the finger with the public. However, some books have also written that the torch of literature shows the way to society. Blinded by the glare of the market, the present society finds a way, not from literature, but from the torch of money and power. Money and money-makers become his innovators and innovators. Fear of invisible swords of the nobles and generals has resided in the heart of the Indian public, not God.

This episode can be solved with seriousness by finding the focal point of love jihad. The concept of love jihad is set on spreading religion and making more and more supporters. Instead of grappling with the questions of life, Muslim fundamentalists are involved in laying the board of religion. The question is, where do problems like love jihad originate? In the confusion of understanding themselves better and more serious in the matter of religion, people forget the methodology of removing their ignorance and they remember only the tricks of distributing the offerings of ignorance and the food of rumors. The illegal earnings ratio produces Dani-Kalyani Seths and big fake leads. Awam spreads the bag with joy and the nobles begin to have misgivings about being the Messiah. In today's era, the lure of laddoos of superstitions has started organizing the skilled craftsmen of power and religion.

Love jihad and its socio-religious propaganda and its status make it necessary to look at politics, money and the politics of money and office from different angles apart from the hijacked-hypnotized media. Due to religious extremism, the prevalent meaning of love jihad is to seduce non-Muslims, especially Hindu girls, to seduce them in love and to force them to accept Islam after marriage. However, in today's technical and scientific consensus, jihad does not have any traditional meaning. In the era of the crisis based on the capital market and livelihood, who is willing to wage a religious war against whom only pundits or maulvis can be understood from worldly concerns. Religion traders do not know that the main need for humans is food and better health. If there is no employment and food grains, then the circumference of the stomach engulfs all the philosophy of religion. A laborer's concern is the survival of his family, not the imitation of the imaginary fears of the Imam. In this age, dreaming and dedication to the establishment of religion should be considered as a mental disease. In love too, the poison of jihad is a symbol of criminal thinking.

In truth, no person can fit into any religious frame in the state of love. If the chains of conditions like caste, class, religion will be laid, then the loud music of love will not arise. The wave of love sweeps all the barricades of religion. After falling in love, the bondage situation seems to be zero and meaningless provided that one is truly in deep love in the true sense. For the sake of any religious mission and for a sly purpose, to gimmick and cheat on a girl of non-religion, should not be a crime of religion, but a crime.

There are some other dimensions of the problem like love jihad which need to be understood. It is not a problem to be seen, but when it is related to the spread of religion, prejudices and political objectives then this subject becomes serious. By the way, it can be said without any hesitation that in every religion-communities there is a problem with 'love'. Where is the freedom and space available to a person very easily for love and romance? People here are extremely suspicious about love or love. What are the big things to be said here, boy-girl friendship is not taken easily. Since there is an atmosphere of strangeness in big cities, there is less interference in this matter, otherwise there is no need to write down what is the situation in small towns and villages.

If there is no acceptance of love in a society with restrictions, then in that case the girl will hesitate to share her love relationship with the parents or family, which will increase the chances of inciting religious or personal love crimes. If we inspire society to break down caste and class walls in the matter of love and marriage, then there will be no situation for spreading a very fake political propaganda like 'Love Jihad'. In the marriage of love, if the whole family and relatives come in their meaningful and effective role and the flow of harmony between the two families flows, then no untoward situation is created even after the girl's conversion. In case of forced conversion, victimization and misbehavior of the girl, action should be taken as per the legal provisions.

Actually, the problem is not a mutual love affair between a Hindu or a Muslim, the problem is with the hypocrisy of religion and ignorance in a situation like love from political chess. The casserole of unpleasantness continues to erode in politics. Communal thinking is to declare Hindu-Muslim love marriage as 'love jihad'. It is a violation of human rights to see inter-religious love and married youth through the prism of doubt. If the youth of any religion, Hindu or Muslim, pretends to love the body only with the intention of happiness, then they should be exposed to the crime of hurting the girl's identity and dignity. They have to explain the fate of this crime that the existence of a girl is not a religious dance. There should be a provision for strict and immediate punishment in such a crime. Now the time has changed. This is not the medieval period, the society should also be aware that girls are no longer the commodity won in war i.e. goods and furnishings but are an integral part of human creation, a fundamental partner in society and intellectual power. Another aspect of the watch on love is that the inertia of tradition and misinterpretation of ancient superiority is the benefit of not having 'space and freedom' (space and freedom) for love in society, because the hotel and market culture have greatly benefited the lovers. Provides privacy and security to meet.

In the face of dreadful bigotry, fulfilling the political agenda of love is nothing more than criminal thinking. The addition of the words unqualified and non-believable 'jihad' with a tarannumi feel like 'love' or 'ishq' is an insult to the faint feeling of love and dedication. No matter how far society and the world goes on, Hindu society is preserved in its mind like mums of unscientific talk of scriptures and is becoming far away from love and its understanding and sensation.

In my opinion, a big aspect of love jihad is to have more sensational information than any real event, to be news. In this era of media punch line impressions, even the biggest event is no longer valued as much as its information, its presentation, that is because information benefits, promotes, grows closer to power. There is some truth or reason to the incident, while the truth of the information and its reason does not have to be any whereabouts. Corey rumors are also disseminated by giving a certificate of information. At many levels, media is no longer a means of mass media and knowledge, but has become a decoction of the herbs of superstition. We have to understand that many colored chemicals have been found in the phase from the event to the creation of information. The more adulteration is, the more flavorful and flavorful the information tastes. The sweetness is not expressed in the solid pulp inside but in the upper coating. Even now, for millions of Hindu families of the country, 'Love Jihad' is only information they have read, advertisement or book, because no such episode as Love Jihad has occurred anywhere around them. This is the era of fake news. Lies have become the ladder to political success. Businessmen of religion and power know that the event affects only a few days or only a few months while information can be exploited for a long time.

Religious organizations have made Love Jihad their shoplifting item. Let's think about how many cases of love jihad have happened or are happening around you in such a huge population of a country like India. Significantly, in every incestuous love affair, not all are based on criminal thinking like love jihad. Yet all intermarriage marriages that have taken place on the basis of a single episode are seen to be linked to the expansion of Islam. Even the love marriages of film stars of Indian cinema and the love marriages of some of the big faces of politics have also been labeled as Love Jihad, which is very childish. For one thing, in the case of love jihad, the flagrant arguments of religion are given as if every Hindu girl is mindless and without any thought, she gets mad at Muslim boys, they are crazy. Admittedly, the love of youth is very emotional and insincere, but even then such episodes rarely reach the marriage. Here parents do not easily agree to marry a boy of their own society or religion, the situation of marriage with a non-religious boy is very big.

The Hindustan Times daily quoted a news item printed on September 12, 2013. In this news, Ashok Singhal of the Vishwa Hindu Parishad, an advocate of decadent-oriented notions based on patriarchy and feudalistic values, had called for a 'Bahu, Beti and Izzat Bachao' movement. Many such individuals with very narrow vision of the changes happening in the country and society, instead of running a big campaign against violence and oppression on daughters and daughters in their Hindu religion, only Muslim boys love Hindu girls. We also try to make a very personal situation like doing political issue. Although progressive society has been rejecting such childish things outright, yet communal forces have been making constant efforts to infect Hindus and Muslims with their whims.

It would be better to understand love jihad on the actual plane rather than the adornments decorated with special religious colors. There is mutual friendship and love between the youth of both communities, whether it is in schools or colleges or in common life. This is not surprising and marriages happen every now and then. But since the ratio of goods-profits and sensations has increased in the politics of religion, the issue of inter-religious love and marriage is becoming more and more stimulating and profitable. On the other hand, the country has not officially rejected misleading lies like Love Jihad. Great camels of truth are also suppressed under the mountain of the agenda of power. A second point to note is that instead of widespread threats like starvation, unemployment, deteriorating health facilities, water crisis and catastrophic pollution, many power-driven organizations are only advertising Love Jihad as a threat to the country. Obviously our priorities should be to solve the big problem first. If the complex challenges like issues of life and life, livelihood and employment are resolved first, then the other problems can be reduced on their own. If the youth of India start to question the government for employment and bread and health, then it will not take time for the love jihad to lie.


Dr. Ashok Kumar Chauhan

Assistant Professor

at Department of Higher Education


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