प्रतिरोध के दो स्वर

Updated: Aug 5

बीते 21 मार्च को विश्व कविता दिवस जब मनाया जा रहा था तब मैं दो कविता-संग्रहों से होकर गुज़र रहा था। पहला संग्रह है- ‘रेख़्ते के बीज और अन्य कविताएं’ और दूसरा संग्रह है- ‘ईश्वर और बाज़ार’।


वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित अपने कविता संग्रह ‘रेख़्ते के बीज और अन्य कविताएं’ में लिखते हैं– ‘यदि देश के सभी कविता-संग्रहों में आग लगा दी जाए, तो दो-चार साल तक आग न बुझे!’ यह कहते हुए कृष्ण कल्पित अपने इसी कविता संग्रह छपने को एक हिमाकत से कम भी नहीं मानते। हालांकि एक स्तर पर यह बात सौ फीसद सत्य जान पड़ती है कि क्योंकि बीते कुछ वर्षों में थोक के भाव में ऐसे कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं जिनके पठनिहार न के बराबर हैं, मानो उन्होंने अपने बुकशेल्फ में रखने के लिए किताब छपवाई या फिर यह दिखाने के लिए वो कवि हैं। लोग कविताएं पढ़ना नहीं चाहते या वो कविताएं खुद अपने पाठकों को अपनी ओर खींच नहीं पातीं, मालूम नहीं क्या वजह है। यह भी कहना उचित नहीं है कि हर कोई कविता की किताब न छपवाए। जो थोड़ा-बहुत लिखता है वो चाहता ही है कि उसकी किताब छपे भी।

इसी बात को आधार मानकर प्रस्तावना में कृष्ण कल्पित अपने कविता संग्रह ‘रेख़्ते के बीज और अन्य कविताएं’ के छपने को हिमाकत की संज्ञा देकर खुद को प्राचीन कविता-परंपरा में विलुप्त कवियों की सुदीर्घ परंपरा का कवि मानते हैं। साथ ही वह युवा कवियों को शुक्रगुज़ार भी मानते हैं कि उन्होंने कवि कृष्ण कल्पित को खोज लिया नहीं तो वो भी विलुप्त परंपरा में शुमार हो गए होते। कवि का यह कथन कवित-साहित्य को समृद्ध करता जान पड़ता है, क्योंकि उस परंपरा में सरहप्पा, गोरख, खुसरो, कबीर, निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध और शमशेर जैसे कवियों की समृद्ध शृंखला है।

अनेक पुरस्कारों से सम्मानित कवि-गद्यकार कृष्ण कल्पित की कविताएं और कहानियां कई भाषाओं में अनुदित होकर पाठकों के काव्य-रसास्वादन का हिस्सा बनती रही हैं। भाषिक साहस के इस धनी रचनाकार की चिंता में संपूर्ण भारतीय समाज और समय तो है ही, लेकिन उनके पूरब की कविता की संज्ञा देते हुए भी उनकी कविताओं की जड़ें भारत-भूमि से जुड़ी दिखती हैं। देश में उदारीकरण के आने से लेकर कोरोनाकाल के आने की आहट तक के बीच 30 साल की तमाम कवित्व-कारगुजारियों का दस्तावेज है कृष्ण कल्पित का यह संग्रह, जिसकी कविताएं अपने पाठकों से पढ़ने के लिए नहीं कहतीं, बल्कि बातचीत करने के लिए कहती हैं। यह बातचीत अभी जारी है इसलिए ‘रेख्ते के बीज’ उर्दू-हिंदी शब्दकोश पर एक लंबा मगर अधूरा वाक्य अब भी पूरा होने के लिए इंतजार में है। पूरब की कविता के मर्म को समझने-जानने के लिए यह ज़रूरी है कि राजकमल प्रकाशन से आए इस कविता-संग्रह को पढ़ा जाए।


बहरहाल, देशभर में थोक के भाव छप रहे कविता-संग्रहों को आग लगाए जाने पर उनके दो-चार साल तक जलते रहने से तो इत्तेफाक रखा जा सकता है लेकिन युवा रचनाकार जसिंता केरकेट्टा के नए कविता-संग्रह ‘ईश्वर और बाज़ार’ को किसी भी सूरत में उस ‘हिमाकत’ की श्रेणी में नहीं रख सकता जिसकी बात कृष्ण कल्पित करते हैं। और यह भी कोई नहीं चाहेगा कि दो-चार साल तक जलने वाली उस आग में ये दोनों संग्रह हों। और अगर हों भी तो ऐसे तमाम कविता-संग्रहों को उस आग में जलने से पहले ही उनके सुधी पाठक खींच लेंगे, ऐसा भी यकीन जान पड़ता है।


जैसे-जैसे हम आधुनिक होते जा रहे हैं, आदिवासी जन-जीवन पर खतरे भी बढ़ रहे हैं। जल-जंगल-जमीन की आदिवासी विरासत को तहस-नहस करने में इस आधुनिकता ने कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। ज़ाहिर है, इस स्थिति में प्रतिरोध के स्वरों का उभरना लाज़मी हो जाता है। और कविता ही एक ऐसा माध्यम है जो अपने कम शब्दों में प्रतिरोध के स्वर को बलंद करने का दम रखती है। जसिंता केरकेट्टा वही स्वर हैं और उनकी कविताएं उसी प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करती हैं। राजकमल प्रकाशन से छपा जसिंता केरकेट्टा का कविता-संग्रह ‘ईश्वर और बाज़ार’ एक तरह से तथाकथित विकास के नाम पर जल-जंगल-जमीन के पूंजीवादी और सत्ताधारी अतिक्रमण का प्रतिवाद करने की जबरदस्त कोशिश है। जिस समग्रता में आदिवासी जीवन के दुख-दर्द की बात जसिंता की कविताएं करती हैं, इससे यह साफ समझ में आता है कि आदिवासी जन-जीवन पर कितना बड़ा संकट आन पड़ा है। आदिवासी अस्मिता खतरे में है और इसी के विरोध में जसिंता की कविताएं खड़ी होती हैं ताकि उस अस्मिता को पूंजीवादी और सत्ताधारी खतरों से बचाते हुए उसकी पहचान को भी बरकरार रखा जाए।


ईश्वर और बाज़ार के नाम पर मनुष्यता को बेच खाने का जो धत्तकर्म चल रहा है वह लोकतंत्र की अवधारणा को भी बुरी तरह से चोटिल करता है। जसिंता की कविताएं इस बात को बहुत भीतर तक पहचानती हैं। बाज़ार यानी पूंजी के छद्म ने ग़रीबों का जीना दूभर किया है तो वहीं धर्म और आस्था के तंत्रों ने मनुष्य होने की ज़रूरी शर्त को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। देश के बाक़ी के समाजों में जिस तरह से जातिवाद ने तोड़-फोड़ मचाया है, ठीक उसी तरह से धर्म और बाज़ार के दुष्चक्रों ने आदिवासी समाज के जीवन को त्राहि से भर दिया है। जसिंता अपनी एक कविता में कहती हैं- मज़दूर जब अपने अधिकार के लिए उठे/ तो कुछ ईश्वर भक्तों ने उनसे/ हाथ जोड़कर प्रार्थना करने को कहा...’ और आगे चलकर यही बात ‘धीरे-धीरे हर हिंसा हमारे लिए/ ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा बन गई...’ धर्म रूपी षड्यंत्र से संचालित लोकतांत्रिक सत्ताएं किस कदर कट्टर और मनुष्य-द्रोही होती हैं, जसिंता अच्छी तरह समझती हैं। इस षड्यंत्र ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विविधता को भी नष्ट किया है और देश के बाक़ी हिस्सों के सामने आदिवासियों को किसी दुश्मन की तरह पेश किया है।

आदिवासियों की पीड़ा के साथ ही पर्यावरण का दोहन, मानव-शोषण, विकास का बेजा दुरुपयोग, पूंजीवादी वर्चस्व, प्रतिरोध, फर्जी राष्ट्रवाद, पूंजीवाद, महिलाओं की हालत, मॉब लिंचिंग, आदिवासिता आदि जैसे सामाजिक सरोकारों पर तीखी नज़र रखते हुए भी जसिंता ने कविता कहने के प्रतिमानों को बनाए रखा है। समग्रता में बात करें तो जहां ‘रेख़्ते के बीज और अन्य कविताएं’ संग्रह अपने पाठकों से संवाद करते हुए बीते तीन दशक की कारगुज़ारियां बयान करता है तो वहीं ‘ईश्वर और बाज़ार’ संग्रह का कैनवस आदिवासी पीड़ा होते हुए भी देश के तमाम वंचित समाज की पीड़ा को बयान करता है। पाठकों को चाहिए कि इन कविता-संग्रहों से होकर गुज़रें ताकि पूरब की कविता संवाद करने के साथ ही आदिवासी जन-जीवन के सरोकार से भी रूबरू हो सकें।


~वसीम अकरम

किताब – रेख्ते के बीज और अन्य कविताएं

कवयित्री – कृष्ण कल्पित

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

मूल्य – 250

किताब – ईश्वर और बाजार

कवयित्री – जसिंता केरकेट्टा

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

मूल्य – 200


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