‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक की रहगुजर’

Updated: Aug 5

पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार और लेखक जाहिद खान की दो किताबों से होकर गुजरना हुआ। दोनों किताबें लोकमित्र प्रकाशन से आई हैं। पहली किताब है- ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ और दूसरी है- ‘तरक्कीपसंद तहरीक की रहगुजर’। इन दोनों को सम्मिलित रूप से भाग एक और दो कहें तो ज्यादा बेहतर होगा।

प्रमाणिकता के साथ लिखी गई ये किताबें हमें प्रगतिशील आंदोलन के उन ऐतिहासिक पन्नों में ले जाती हैं जिन्हें पढ़ने-जानने के लिए बहुत मशक्कत की दरकार होती है। तरक्कीपसंद तहरीक यानी प्रगतिशील आंदोलन की विचारधारा जिस तरह खोती जा रही है और तमाम बुद्धिजीवियों पर तरह-तरह की मुश्किलें आयद हो रही हैं, ऐसे दौर में जाहिद खान की लिखी इन दो किताबों को पढ़ना बहुत मायने रखता है। ये किताबें तरक्कीपसंद तहरीक की मद्धम पड़ चुकी रोशनी को तेज करते रहने का जज्बा भी देती हैं।

इन दोनों किताबों में कुल मिलाकर 60 आलेख हैं और दोनों ही किताबों को तीन-तीन विभागों में बांटा गया हैं। पहले भाग में उर्दू साहित्य है, दूसरे में हिंदी साहित्य है तो वहीं तीसरे भाग में रंगमच है। दोनों किताबों के लेख जाहिद खान एक जगह लिखते हैं- ‘प्रगतिशील आंदोलन को पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, रवींद्रनाथ टैगोर, अल्लामा इकबाल, खान अब्दुल गफ्फार खान, प्रेमचंद जैसी हस्तियों की सरपरस्ती हासिल थी।’ इससे जाहिर होता है कि उस वक्त यह तहरीक भारत की विकास यात्रा के लिए कितनी जरूरी थी।


‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ में जहां इंडियन प्यूपिल्स थिएटर एसोसिएशन यानी ‘इप्टा’ की यात्रा है, तो वहीं ‘तरक्कीपसंद तहरीक की रहगुजर’ में प्रगतिशील लेखक संघ यानी ‘प्रलेस’ के क्रांतिकारी इतिहास का प्रमाणिक दस्तावेज है। साहित्य, सिनेमा, संगीत, थिएटर, शायरी, पेंटिंग जैसी तमाम कलाएं जो प्रतिरोध का स्वर बुलंद करती हैं, इनको रचने वाली जिंदगियों और उनके दौर के अनमोल किस्सों को जानना एक क्रांतिकारी इतिहास के दौर से होकर गुजरना सरीखा है। वो तमाम लेखक-कलाकर लोग प्र‍गतिशीलता के अलमबरदार बने और जिन्होंने गरीबों-मजदूरों का साथ देकर सत्ता की दमनकारी नीतियों का विरोध किया, वो सभी के कुछ रोचक और ऐतिहासिक पहलू इन किताबों में दर्ज है।


‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ के पहले भाग में जाएं तो हम पाते हैं कि उर्दू साहित्य के एक से बढ़कर एक नाम शामिल हैं। इसमें सज्जाद जहीर, डॉ. रशीद जहाँ, कृश्न चंदर, राजिंदर सिंह बेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास, सआदत हसन मंटो, इस्मत चुगताई, रजिया सज्जाद जहीर, फैज अहमद फैज, मखदूम मोहिउद्दीन, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी जैसी नामचीन हस्तियां शा‍मिल हैं। दूसरे भाग में हिंदी साहित्य के कथा-सम्राट प्रेमचंद, भीष्म साहनी, डॉ. कमलाप्रसाद, राही मासूम रजा, शानी, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव जैसे नाम हैं। तीसरे भाग रंगमंच में प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर, गीतकार शैलेंद्र, नेमीचंद जैन, ए.के. हंगल, विजय तेंदुलकर, नाग बोडस जैसे महान नाम आते हैं जिनके बारे में पढ़ना प्रगतिशील आंदोलन की सार्थक कारगुजारियों से होते हुए इनके व्यक्तिगत योगदान से होकर गुजरने जैसा है। इस तीसरे भाग यानी रंगमंच के योगदान की बात करें तो इसमें रंगकर्मियों का संघर्ष बहुत मायने रखता है। इप्टा के नाट्यकर्मियों की महती भूमिकाओं की झलकियां हम अक्सर अखबारों और पत्रिकाओं में देखा करते हैं। ऐसे में हबीब तनवीर, विजय तेंदुलकर, नेमिचंद जैन जैसे महान रंगकर्मियों के बारे में जानने के साथ ही ‘इप्टा’ के इतिहास से रूबरू होना अपने आप में रंगमंच की यात्रा के साथ चलने जैसा है।

अब बात करते हैं दूसरी किताब ‘तरक्कीपसंद तहरीक की रहगुजर’ की। यह किताब भी लेखों का संग्रह है। पहली किताब की तरह इस किताब में भी तीन भाग हैं। यानी पहले भाग में उर्दू साहित्य है, दूसरे में हिंदी साहित्य है तो वहीं तीसरे भाग में रंगमच यानी इप्टा के संस्कृतिकर्मी शामिल हैं। उर्दू साहित्य में हसरत मोहानी, फिराक गोरखपुरी, अली सरदार जाफरी, मजाज, मोईन अहसन ‘जज्बी’, वामिक जौनपुरी, जोश मलीहाबादी, मजरूह सुल्तानपुरी, एहसान दानिश, सैयद मुत्तलबी फरीदाबादी, जोय अंसारी, गुलाम रब्बानी ‘ताबाँ’, अहमद नदीम कासमी, मुज्तबा हुसैन जैसे नाम शामिल हैं जिनके बारे में पढ़ना आज बहुत ज़रूरी हो गया है। दूसरे भाग यानी हिंदी साहित्य के लेखकों में यशपाल, रांगेय राघव, नरेंद्र शर्मा, नामवर सिंह, खगेंद्र ठाकुर, चंद्रकांत देवताले हैं। वहीं तीसरे भाग रंगकर्म में इप्टा के सशक्त हस्ताक्षर बलराज साहनी, शौकत कैफी, प्रेम धवन, राजेंद्र रघुवंशी जैसी शख्सियतें मौजूद हैं। आखिर कौन है जो इन महान लोगों के बारे में और इनके काम के बारे में नहीं जानना चाहेगा?


‘तरक्कीपसंद तहरीक की रहगुजर’ किताब की खास बात यह भी है कि इसका पहला चैप्टर ‘प्रलेस’ पर है। प्रेलस यान प्रगतिशील लेखक संघ। इस संगठन का स्थापना काल आजादी से पहले का है। जाहिर है, आजादी के आंदोलन में इसकी महती भूमिका रही है। उस दौर में यह संगठन देशभर में न सिर्फ फैला हुआ था बल्कि एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संपदा भी खड़ा कर रहा था। खासतौर से उर्दू अदब ने जो आजादी आंदोलन में अपनी शानदार भूमिका निभाई है, उसे हर शख्स को पढ़ना-समझना चाहिए। आज जिस तरह से उर्दू के साथ बरताव हो रहा है कि यह सिर्फ एक कौम की भाषा है, वह निहायत ही गलत है। क्योंकि प्रगतिशील साहित्य में हम देखते हैं कि किस तरह से लेखकों और क्रांतिकारियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर वर्तानिया सरकार से लोहा लिया और देश को आजादी दिलाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत जैसे देश में कोई एक भाषा किस मजहब की प्रतिनिधि हो ही नहीं सकती। निश्चित रूप से उर्दू अदब का योगदान आज के दौर में प्रासंगिक है, क्योंकि आज के हालात भी कुछ बेहतर नहीं हैं।


आज जिस तरह से देश में राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संकट है, उसे देखते हुए अब फिर से तरक्कीपसंद तहरीक को ताकत देने की जरूरत है। इस ऐतबार से लेखक जाहिद खान को शुक्रिया जिन्होंने इन दो बेहतरीन किताबों को लिखा और हमारी समझ में इजाफा किया। किसी को साहित्य पढ़ना न भी पसंद हो तो भी मैं कहूंगा कि इन किताबों को पढ़ा जा सकता है, क्योंकि इनमें शख्सियतों की जिंदगी दर्ज है, जिन्हें पढ़कर आप इतिहास के कुछ अनछुए पहलुओं से रूबरू होंगे।

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दो किताबें – ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक की रहगुजर’

प्रकाशक – लोकमित्र प्रकाशन

मूल्य – 220 रुपये (पेपरबैक)


~वसीम अकरम

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