गांधीजी ने अपने प्रिय शिष्य जवाहर का चयन बहुत सोच समझकर किया था

Updated: Aug 5

देश के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर विशेष

स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि हमारे लिए न केवल उन्हें जानने का एक मौका है अपितु उस अंतराष्ट्रीय नजरिये और निगाह को देखने का भी एक मौका है जो उन्हें महात्मा गांधी से विरासत में मिली। उनकी पुण्यतिथि पर हम उस स्वर्णिम रूमानी दौर और उसके बाद के राष्ट्र निर्माण दौर को समझने की एक कोशिश करेंगे जिस पर आज का भारत खड़ा है। नेहरू ने उस स्वर्णिम रूमानी दौर का नेतृत्व किया, अपने वक्त को समझने की कोशिश की, उसकी मुश्किलात को समझने और उनका हल खोजने की कोशिश की। उन्होंने इस बात की कोई परवाह नहीं की कि उन्हें आने वाली पीढी याद करेगी अथवा नहीं करेगी।


अमृता शेरगिल को एक नकचढ़ी चित्रकार के रूप में जाना जाता है। वे किसी की आत्मकथा को पढ़ने से परहेज करती थीं। जब नेहरू की आत्मकथा उन्होंने पढ़ी तो उन्होंने पंडित जी को पत्र लिखा ''आम तौर पर मैं आत्मकथाएं नहीं पढ़ती। क्योंकि उनमें आत्मप्रशंसा का इस तरह का भाव होता है कि ''जब समुंदर ने मुझको देखा'' । लेकिन आपकी आत्मकथा में विनम्रता का भाव है कि ''मैंने समुंदर को देखा, समुंदर ने मुझको नहीं देखा।'' अमृता शेरगिल ने लिखा कि मुझे आत्मकथा पढ़कर ऐसा लगता है कि आप भारत को जानने के लिए इच्छुक हैं उसे जीतने के लिए नहीं। मुझे आपका चेहरा निहायत ही दिलचस्प, कोमल और संशय में घिरा हुआ दिखता है।


अमृता शेरगिल ने जो लिखा वह कोई अतिशयोक्ति नहीं है, अगर आप 1949 में प्रकाशित नेहरू अभिनन्दन ग्रंथ जिसका सम्पादन श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय ने किया था, पढ़ेंगे तो उसमें दुनिया भर के राजनेता चाहे वो मार्शल टीटो हों, नासिर हों, सुकर्णों हों, हों ची मिन्ह हों या एंक्रूमा हों सभी लोग नेहरू के बारे में यह कहते मिलेंगे क़ि नेहरू से बातचीत करते हुए आप उस जमीन पर रहते ही नहीं थे जहां आप बातचीत कर रहे हैं । वे आपको उठाकर किसी ऊंची दुनिया में ले जाते थे। लेकिन नेहरू की विनम्रता देखिए वे यह श्रेय खुद न लेकर राष्ट्रपिता बापू को देते हैं। नेहरू कहते हैं कि बापू का यह बड़प्पन था कि उन्होंने मुझ जैसे अनेकों साधारण लोगों को जमीन पर से उठाया और एक ऊंचे उत्कृष्ट स्तर पर लाकर हमेशा के लिए खड़ा कर दिया। बापू की यह महानता ये थी कि उन्होंने हम जैसे साधारण लोगों के भीतर सोई हुई उत्कृष्टता को जगाया। उनके कारण हमने खुद को आजाद महसूस किया हमने अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी की और गर्व से सर तान लिया।


गांधी और नेहरू का रिश्ता बहुत जटिल गुरु शिष्य जैसा था। गांधीजी को हाँ में हाँ मिलाने वाला शिष्य नहीं चाहिए था। गांधीजी जब नोआखाली में थे तब भी गुरु शिष्य में खतो किताबत चलती रहती थी। एक जगह गांधीजी कहते हैं कि मैं तो कैदी हूँ जवाहर का। जवाहर और पटेल जैसा कहेंगे मैं वैसा करूँगा। I am prisoner of Nehru. और उनकी खतो किताबत लगातार चलती रहती है। गांधी कहाँ है आग के बीच में और गांधी की बहुत दिलचस्पी इस बात में है कि दिल्ली में क्या हो रहा है? दिल्ली में संविधान सभा चल रही है। उनकी बहुत दिलचस्पी है कि संविधान सभा में बहसें क्या हो रही हैं? गांधी की दिलचस्पी इस बात में है कि ये जो नया मुल्क बनेगा हिंदुस्तान वो किस किस्म का मुल्क बनेगा? Objective Resolution नेहरू द्वारा पेश किया जा चुका है और गांधी नेहरू को लिखते हैं कि इस Objective Resolution पर टिके रहना, इससे तिल भर भी हिलना नहीं। यह एक खतो किताबत है जो गांधी और नेहरू के बीच लगातार चलती रहती है।


जब देश आजाद हुआ तो गांधीजी ने फैसला किया कि भारत में लार्ड माउंटबेटन ही गवर्नर जनरल रहेंगे। इस पर उनसे सवाल किया गया और गांधीजी ने कहा- हां, हमने ये फैसला किया है कि माउंटबेटन देश के गवर्नर जनरल होंगे। लेकिन ध्यान रहे कि ये फैसला हमारा है। अभी तक माउंटबेटन वायसराय के रूप में ब्रिटिश हुकूमत के नुमाइंदे थे लेकिन अब वो हमारे नौकर हैं। हमने उन्हें गवर्नर जनरल बनाया है। गांधीजी ने अंग्रेजी में कहा Now Mauntabetan is our servent, and he is accepted being as a servent.


गांधीजी के इस फैसले पर नेहरू ने आर के करेन्जिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि बापू के इस फैसले का एक गहरा अर्थ यह था कि जो आज तक हमारा शासक था वह अब हमारी सलाह पर हमारे सेवक के रूप में हमारे हितों के अनुसार काम करने के लिए तैयार है। बापू का अटल सिद्धांत था कि हम सभी के अंदर एक दैवीय अंश छिपा हुआ है। जरूरत उस दैवीय अंश के दीपक की लौ को उभारने वाले और लंबे समय तक उस लौ को बनाये रखने वाले हाथों की है। कई उंगलियां ऐसी होती हैं जो दीपक की लौ को बुझा देती हैं। बापू ने भारत माता की इस लौ को अपने कोमल हाथों से अपनी अंतिम सांस तक सहेजा।


नेहरू ने अपनी वसीयत में हिंदुस्तान से अपने रिश्ते के बारे में लिखा कि मुझे ऐसे शख्स के रूप में याद किया जाय, जिसने भारत को बहुत प्यार किया जिसके लोगों ने भी मुझे उतना ही अधिक प्यार किया। मेरी भस्म को पूरे भारत में फैला दिया जाय क्योंकि जिस जमीन से, जिन नदियों से मैं खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ , मैं उसी में मिल जाना चाहता हूँ।


नेहरू की कठिनाई ये थी कि वे एक साथ दो दौर में संघर्ष करते रहे। एक दौर जिसे हम रूमानी दौर या काव्यात्मक दौर कह सकते हैं। इस दौर में वे भारत की आजादी के लिए गांधी के साथ कदमताल कर रहे थे। दूसरा दौर, राष्ट्र निर्माण दौर था उसे साहित्यिक भाषा में गद्यात्मक दौर कह सकते हैं। नेहरू दरअसल कोमल काव्यात्मक दौर से कठोर गद्यात्मक दौर में प्रवेश कर रहे थे। इसी दौर में भारत में भाखड़ा नांगल, सरदार सरोवर जैसे बांध, भिलाई स्टील प्लांट, AIIMS, IIT, IIM, परमाणु ऊर्जा आयोग, चुनाव आयोग, योजना आयोग, भाभा अनुसंधान परिषद, अंतरिक्ष आयोग, ISRO, थुम्बा राकेट केन्द्र, फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी, अप्सरा, साइरस, जेरलीना जैसे नाभिकीय रिएक्टर और साहित्य अकादमी सहित कई संस्थान बनते हैं।


इन सब उपलब्धियों के बाद भी, जब ब्लिट्ज के प्रधान संपादक आर के करेन्जिया नेहरू से एक इंटरव्यू में पूछते हैं कि आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? नेहरू ने थोड़ा सोचकर कहा कि मैं इस बात को अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूं कि 1947 के भारी तूफान के बाद भी हमने भारत के इस लड़खड़ाते जहाज को स्थिर कर लिया और मैँ इससे बहुत तस्सली महसूस करता हूं, कि हमने लोगों को चैन से रहने के अवसर उपलब्ध कराए और उन्हें एक मनोवैज्ञानिक शांति प्रदान की।


यह कोई झूठी विनम्रता नहीं थी। आप किसी के स्वर से पहचान सकते हैं कि वह ईमानदार है कि नहीं है। किसी के प्रणाम करने से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह प्रणाम कर रहा है या आपके सीने में गोलियां दागने वाला है। नेहरू को श्रद्धांजलि देते हुए श्री राजगोपालाचारी ने जो श्रद्धांजलि दी वह ध्यान देने योग्य है उन्होंने कहा कि हमारे बीच का जो सबसे सभ्य और सुसंस्कृत राजनेता था वह चला गया।


नेहरू को दुनिया इसलिए याद करती है कि उनके अंदर अंतराष्ट्रीय महत्व की एक निगाह थी, सोचने का एक बड़ा नजरिया था, सम्बन्ध बनाने की एक नई भाषा थी। अपने वैचारिक विरोधियों की आवाज को सुनने और उनका सम्मान करने की एक भाषा थी। नेहरू अपना काम कर स्वर्ग सिधार चुके हैं। नेहरू और गांधी के गुणगान और कीर्तन करने की कोई जरूरत नहीं। वे इन सबसे परे हैं और उनका मूल्यांकन अगर आज भारत के लोग नहीं भी करेंग तो यकीन मानिए हार्वर्ड में, ऑक्सफोर्ड में, ऑस्ट्रेलिया में, अमेरिका में और दुनियाभर के विश्वविद्यालयों में नेहरू व गांधी पढ़े जाते रहेंगे। हो सकता है कि गांधी और नेहरू को भारत छोड़ दे और पूरी दुनिया अपना ले।


27 मई 1964 को संसदीय लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं को स्थापित करने वाले जवाहर ने अपनी अंतिम सांस लेकर इस दुनिया से खुद को विदा कर लिया। नेहरूजी की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन।


नोट- यह लेख मौलिक नहीं है। लेख के संदर्भ कई लेखकों व उनके भाषणों से लिये गए हैं।


लेखक- शिवकुमार शौर्य (संस्कृति विभाग लखनऊ) Also Read

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