Under a Delhi flyover, Van Phool School is changing the lives of young children

Updated: Aug 5

Tremendous work for upliftment of underprivileged by NP Naresh Pal and Manthan Youth Club- Regtd. in Yamuna Khadar, Mayur Vihar Phase 1, Delhi - 91


On a regular day at 7 AM, around 140-150 students reach their makeshift school under the Mayur Vihar flyover in Delhi. The school runs in two separate shanties made of bamboo and wood, one for children below five years and the other for classes 4th and above.

Students from nearby villages study all subjects and take part in extracurricular activities. They even appear for exams every 15 days. Apart from free education, these children are also served hot and fresh midday meals every day.


The school is run by three teachers, and at times, people from nearby areas visit and donate stationery, books or other educational supplies to these children. Naresh, the founder of this makeshift school, has worked hard to make this as sustainable as possible. He has used an old bamboo temple as the storeroom, waste tarpaulin sheet for shelter and discarded benches from private schools as the furniture. The two washroom facilities were donated by an NGO. Some people also donated a few saplings for the open area.

Naresh began teaching in 2011 when he migrated from his village in Uttar Pradesh. He is currently preparing for the UPSC exams.


“Running a school for 150 students every day is not easy. We as a community should come forward and see it as a challenge. Our civil society should take out time and shape their lives, especially in the time of COVID-19”, says Naresh.


At a time when the pandemic brought disruption in education, this makeshift school brought relief to the worried parents and children. Almost none of their parents own a smartphone, in fact, there is not a single mobile phone in many households.


Most of the parents of these children are domestic help, farmers, or drivers. Amid the pandemic, these students have been taught social distancing, proper hygiene, and necessary precautions.


“We love studying here. Our favourite subjects are Maths and Science. I want to become a teacher when I grow up. I will also teach students”, says Akash.


And this isn’t the only one. In northeast Delhi’s Yamuna Khadar area, temporary schools, also known as “Van Phool Schools”, imparting free education to children is a common sight. There are many volunteers and teachers who spare a few hours every day.


Khushboo Kawat, a teacher here currently pursuing Political Science Honours at Delhi University’s PGDAV college, teaches students from class 5th till 10th.


“We have seen a drastic improvement in almost every student. All of them know how to read and write. They are motivated to follow their dreams,” says Khushboo.


Each day after teaching between 7 to 10 AM, the teachers disperse to attend their own online classes. Many have themselves been students of the Van Phool schools. As the clock turns to 10 AM, teachers wipe clean their whiteboards and the students prepare to head home.


~Nishant Rathore President at Manthan Youth Club- Regtd.


Also Read


Click to read more articles

HOME PAGE Do you want to publish article, News, Poem, Opinion, etc.?


Contact us- nationenlighten@gmail.com | nenlighten@gmail.com



दिल्ली फ्लाईओवर के नीचे वन फूल स्कूल बदल रहा है छोटे बच्चों का जीवन


वंचितों के उत्थान के लिए एनपी नरेश पाल एवं मंथन यूथ क्लब-रजि. यमुना खादर, मयूर विहार फेज 1, दिल्ली - 91 बहुत मेहनत कर रहे है।


दिल्ली में मयूर विहार फ्लाईओवर के नीचे नियमित रूप से सुबह 7 बजे लगभग 140-150 छात्र अपने अस्थायी स्कूल पहुंचते हैं। स्कूल बांस और लकड़ी से बनी दो अलग-अलग झोंपड़ियों में चलता है, एक पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए और दूसरा कक्षा चौथी और उससे ऊपर के बच्चों के लिए।


आस-पास के गांवों के छात्र सभी विषयों का अध्ययन करते हैं और पाठ्येतर गतिविधियों में भाग लेते हैं। वे हर 15 दिन में परीक्षा भी देते हैं। इन बच्चों को मुफ्त शिक्षा के अलावा हर दिन गर्म और ताजा दोपहर का भोजन भी परोसा जाता है।


स्कूल तीन शिक्षकों द्वारा चलाया जाता है, और कभी-कभी, आस-पास के इलाकों के लोग इन बच्चों को स्टेशनरी, किताबें या अन्य शैक्षिक आपूर्ति दान करते हैं। इस अस्थायी स्कूल के संस्थापक नरेश ने इसे यथासंभव टिकाऊ बनाने के लिए कड़ी मेहनत की है। उन्होंने भंडार कक्ष के रूप में एक पुराने बांस के मंदिर, आश्रय के लिए बेकार तिरपाल शीट और निजी स्कूलों की बेंचों को फर्नीचर के रूप में इस्तेमाल किया है। दो वाशरूम सुविधाओं को एक एनजीओ द्वारा दान किया गया था। कुछ लोगों ने खुले क्षेत्र के लिए कुछ पौधे भी दान किए।


नरेश ने 2011 में पढ़ाना शुरू किया जब वह (उत्तर प्रदेश) अपने गांव से यहां आये। वह वर्तमान में यूपीएससी परीक्षा की तैयारी कर रहे है।


“हर दिन 150 छात्रों के लिए एक स्कूल चलाना आसान नहीं है। हमें एक समुदाय के रूप में आगे आना चाहिए और इसे एक चुनौती के रूप में देखना चाहिए। हमारे नागरिक समाज को समय निकालना चाहिए और अपने जीवन को आकार देना चाहिए, खासकर COVID-19 के समय में”, ~ नरेश (संस्थापक)


ऐसे समय में जब महामारी ने शिक्षा में व्यवधान लाया, इस अस्थायी स्कूल ने चिंतित माता-पिता और बच्चों को राहत दी। उनके माता-पिता में से लगभग किसी के पास स्मार्टफोन नहीं है, वास्तव में, कई घरों में एक भी मोबाइल फोन नहीं है।


इन बच्चों के अधिकांश माता-पिता घरेलू सहायिका, किसान या ड्राइवर हैं। महामारी के बीच, इन छात्रों को सामाजिक दूरी, उचित स्वच्छता और आवश्यक सावधानियां सिखाई गई हैं।


"हमें यहां पढ़ना अच्छा लगता है। हमारे पसंदीदा विषय गणित और विज्ञान हैं। मैं बड़ा होकर शिक्षक बनना चाहता हूं। मैं छात्रों को भी पढ़ाऊंगा”, ~ आकाश (छात्र)


और यह केवल एक ही नहीं है। पूर्वोत्तर दिल्ली के यमुना खादर क्षेत्र में, अस्थायी स्कूल, जिन्हें "वन फूल स्कूल" के रूप में भी जाना जाता है, बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करना एक आम दृश्य है। कई स्वयंसेवक और शिक्षक हैं जो हर दिन कुछ घंटे निकालते हैं।


दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में राजनीति विज्ञान ऑनर्स कर रही यहां की शिक्षिका खुशबू कावत पांचवीं से दसवीं तक के छात्रों को पढ़ाती हैं।


“हमने लगभग हर छात्र में भारी सुधार देखा है। ये सभी पढ़ना-लिखना जानते हैं। वे अपने सपनों का पालन करने के लिए प्रेरित होते हैं, ” ~खुशबू (छात्रा)


प्रत्येक दिन सुबह 7 से 10 बजे के बीच पढ़ाने के बाद, शिक्षक अपनी ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेने के लिए तितर-बितर हो जाते हैं। कई स्वयं वन फूल स्कूलों के छात्र रहे हैं। जैसे ही घड़ी सुबह 10 बजे होती है, शिक्षक अपने व्हाइटबोर्ड साफ करते हैं और छात्र घर जाने की तैयारी करते हैं।


~निशांत राठौर अध्यक्ष मंथन यूथ क्लब-रजि.


Also Read

Click to read more articles

HOME PAGE Do you want to publish article, News, Poem, Opinion, etc.?

Contact us- nationenlighten@gmail.com | nenlighten@gmail.com

2,838 views0 comments