पितृसत्तात्मक समाज की वास्तविकता

Updated: Aug 15

मैंने बोला था पापा से की...... दहेज का पैसा कोचिंग में लगा दे पर वो शांत चले गए..... कुछ ना बोले ..... समझ गई थी मैं, ये उनका नहीं ' इस समाज का दबाव है' ।

घर में बड़ी खुशियां थी, क्योंकि 'मैं' इस दुनिया में आने वाली थी......फिर पता चला कि....वह तो मेरी गलतफहमी थी, सब बड़े दुखी से थे...... बोल रहे थे कि...... "एक लड़की पहले से थी….. भगवान ने फिर एक और दे दी"

मेरे दादा दादी को 'वंश' की चिंता थी, मेरे माता-पिता को बुढ़ापे के सहारे की चिंता थी। वह पडोसी जो रोज मां को " दूधो नहाओ पूतों फलो " के आशीर्वाद देकर जाया करते थे .....बड़े शांत लग रहे थे। हां, मुझे याद है..... बस मेरी मां मुझसे बहुत खुश थी..... पर वह बेचारी समाज के उन तनो से शांत थी। मैं समझ नहीं पाई कि मेरी गलती क्या थी ? जिंदगी तो मिली थी मुझे पर जीने की आजादी नहीं.....

खैर मैं 6 साल की हो गई !

मुझे वह गुड्डा- गुड़िया ,चकरा- बेलन..... जैसे खिलौने कभी पसंद नहीं आते थे, पर पता नहीं क्यों ? मुझे हर बार यही सब मिले। मुझे वह फ्रॉक, और वो सूट भी कभी पसंद नहीं थे, मुझे तो लड़के जैसे जींस पैंट पसंद थी…… पर मुझे कपडे भी मेरी पसंद के नहीं मिले। यूं तो बड़ी शैतान थी मैं …… वह सारे गली के बच्चे मुझसे बड़ा डरा करते थे..... पर धीरे-धीरे उन लोगों ने ही मुझे शांत बनने पर मजबूर किया ।

समझ तो मैं तब भी नहीं पाई थी क्यों है ऐसा ?

यूं ही 13 साल की हो गई मैं !

धीरे-धीरे पता चला कि जिंदगी कैद सी हो गई..... सुना था मैंने वह बोला करते थे की "मैं बड़ी हो गई"

कमजोर तो नहीं थी मैं.....पर एक सहारा चाहिए...... वह बोला करते थे VO ऐसा , जाने क्यों ? खैर यह तो मैं आज तक नहीं समझ पाई !

हंसी आती थी मुझे जब वह मेरे छोटे चचेरे भाइयों को मेरा सहारा बना कर भेजा करते थे। कमजोर क्या मैं तो अपने विद्यालय की टॉपर हुआ करती थी। हां मेरे अध्यापक बोला करते थे, "बड़ी तेज दिमाग है मेरा" पर वह दिमाग मेरे तक ही सीमित था ……. क्योंकि घर पर मुझसे बोला गया था कि ...."लड़कियां ज्यादा बोला नहीं करती शांत रहा करो".... अपने बुद्धि अपने तक रखो ...!!

बोल तो ....किसी को कुछ ना पाई...... हां पर... मैं उन सभी को भाप रही थी ।

यूं ही 18 की हो गई मैं !

ऐसा नहीं था कि मेरे सपने नहीं थे.... किसी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर बनना चाहती थी। तभी उन लोगों ने जो बचपन से षड्यंत्र रचते आए थे आवाज दी…."...मैं जवान हो गई" !!

हां...... मैं भी अपने गाँव से दूर बड़े सहर में पढ़ना चाहती थी। अपने चचेरे भाइयों की तरह...... जो मेरी कक्षा में हमेशा पीछे से प्रथम आया करते थे। शहर तो दूर बाहर जाना भी धीरे-धीरे बंद सा हो गया.…. छोटी छोटी चीजों के लिए दूसरे के लिए मोहताज हो गई...... मुझे याद है..... वह मेरा गली के बच्चों को रिश्वत देकर वह सामान मंगाना ।

मुझे याद है पूरे दिन पढ़ाई के बाद शाम को खाना बनाकर शांति से खाने बैठना और बार-बार उस थाली से उठना क्योंकि..... चचेरे भाइयों को खाना देना होता था, शहजादे .... पूरे दिन खेलकर जो आया करते...... तो थक जाते थे ।

जाने कब ऐसे ही मैं धीरे-धीरे मैं बोझ हो गई !



वह बोला करते थे मेरी शादी के लिए ही इतना पैसा इकट्ठा कर रहे हैं,.... बड़े दुखी से लगते थे । यह सुनकर अब तो मैं खुद को भी एक बोझ लगने लगी थी । मैंने बोला था पापा से की...... दहेज का पैसा कोचिंग में लगा दे पर वो शांत चले गए..... कुछ ना बोले ..... समझ गई थी मैं, ये उनका नहीं ' इस समाज का दबाव है' ।

हां कुछ लोग थे....... जिनके हालातों पर अक्सर मुझे तरस आया करता था| वही लोग बोला करते थे....... "लड़की है.... ज्यादा पढ़ाओगे तो हाथ से निकल जाएगी"।

बचपन से अब तक कुछ मन का नहीं मिला था और ना ही..... शादी मन की हुई !

हां मैं अब...... 'बेटी' से 'बहू' थी...... सच कहूं तो बहू कम ‘नौकरानी’ ज्यादा थी । अपना तो ध्यान ही नहीं था मुझे……. जैसे सेवा करना ही बस "मेरा कर्म धर्म" था। जाने कब मेरी पसंद सूरज की तरह ढलती रही..... और दूसरों की पसंदो को पूरा करना जरूरत बन गई |

मुझे याद है...... मेरे हजार बार कहने के बाद पापा ने बड़ी मुश्किल से अपने लिए एक बाइक खरीदी थी.... और जब मेरी शादी हुई तो उन्होंने बिना कहे मुझे कार देदी थी।

कार ही नहीं, उन्होंने जाने कितने सालों की कमाई दी थी | पर मैंने तो बस एक आजाद ख्यालों वाली दुनिया मांगी थी ..... जहां अपने मन के परिंदों को उड़ने के लिए छोड़ पाती..........

हां......अभी तक मुझे सोना चांदी और बड़ी-बड़ी चकाचौंध जैसी चीजे मेहंगी लगा करती थी , पर अब पता चला है कि.... सबसे महंगा तो 'आत्मसम्मान' था | जो मुझे कभी मिला ही नहीं, जिसकी खोज मुझे पहले भी जारी थी, और आज भी जारी है |

हां मेरे पति अक्सर, शराब के नशे में बेवजह मुझे बहुत पीटा करते थे..... ऐसा नहीं कि मुझे लड़ना नहीं आता था मैं भी जूडो कराटे में स्टेट लेवल पर गोल्ड जीत चुकी थी...... पता नहीं क्यों ......मैं बस शांत थी ।

शायद ही बचपन से आज तक कोई दिन गया होगा, जिस दिन आंखों में आंसू ना आए हो.... पर यह आँसू आज तक किसी ने देखे नहीं है । एक बार मायके वालों से भी बोला था..... पर उन्होंने बोला....... "बेटा अब रहना तो वही है लड़कर फायदा क्या?"

ना मायके का कोई सहारा था, ना ससुराल से..... बस में जी रही थी..... और जी रही हूं...... कहने को तो सरकारी मदद की बहुत से लोगों ने राय दी पर चुप रहने का कारण बस मैं समझती थी ,क्योंकि.... आज मैं एक 'मां' भी हूँ ।

हां एक बार बड़े परेशान होकर आत्महत्या करने का भी सोचा था...... फिर पता चला कि...... यह बस मेरी नहीं....... उस हर एक भारतीय महिला की कहानी है।

महिलाएं अपना पूरा जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर देती है ,और बदले में स्वाभिमान तक हासिल नहीं कर पाति है। मैं तो बस आजादी, समानता और न्याय चाहती थी, कि लोगों ने....... मुझे 'चरित्रहीन' बना दिया | मुझे याद है .... बहुत बार, सही होते हुए भी खुद को रोका था मैंने....... कि लोग मुझे फिर नया कुछ ना बना दे.....

कभी-कभी ज्यादा सोच कर परेशान हो जाती हो और थोड़ी शराब पी लेती हूं । तो वही समाज के ठेकेदार अलग-अलग राय देते हैं । मेरे पति से बोलते हैं कि शराब से लीवर गुर्दे खराब होते हैं और मेरे पीने पर मुझे चरित्रहीन बोलते हैं । मेरे समझ नहीं आया कि...... क्या मेरे लिवर गुर्दे नहीं हैं ? या पुरुष का कोई का चरित्र नहीं है ?

अब तक हर ताने को चुपचाप सुना था मैंने ,जब मैंने खुल कर बोलना शुरू किया ... फिर से उन लोगों ने मुझे रोका बोला कि "महिलाओं को समझ नहीं होती, उन्हें बोलना नहीं आता, उनका काम बस रसोई घर तक ही सिमित है...... बड़ी हैरान थी मैं....... यह सब बोलने वाले भी वही लोग है ..... जिन्होंने महिलाओं की आवाज छीनी हैं ।

मुझे इंतजार है उस दिन का जब सब ठीक होगा और महिलाएं अच्छी जिंदगी जी पाएंगे आज मैं बिना नाम के लिखती हूं क्योंकि कोई पहचान नहीं चाहती ..... बस समानता चाहती हूँ ....... उस हर एक महिला के आंख से आंसू पूछना चाहती हूँ ....... डॉक्टर कहते हैं सोच सोच कर डिप्रेशन हुआ है मुझे मैं कहती हूं उनसे....... इस देश की हर महिला को डिप्रेशन है कभी सरकार जांच और आंकड़े को तो दिखाएं ।

(भारतीय महिला )


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