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ज़रा हमारी शिक्षा व्यवस्था को ही देख लीजिए हर किसी को ज़्यादा अंकों वाला बुद्धिमान तो चाहिए पर ज़्यादा और बेहतर सुलझी हुई समझ, भाव एवं विचारों वाला सच्चा प्रतिभावान नहीं।

आज हर दूसरे बच्चे के 100 में से 90 से 99 अंक तो आ रहे है पर उनमें अच्छे भाव, विचार और समझ पैदा नहीं हो पा रही है। भौतिक बुद्धिमानी और तार्किकता तो पैदा हो रही है परन्तु भावनात्मक, कलात्मक, सृजनात्मक एवं सौन्दर्यपरक प्रतिभा पतन की ओर जा रही है, मूल्यों का जैसे ह्रास हो रहा है।


बुद्धिमानी से बुलेट ट्रेन तक की प्रगति तो की है हमने पर जिस प्रतिभा के बल पर एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता था वहाँ सिर्फ़ विकृति ही आई है। फिर चाहे वो आत्महत्या की प्रवृति हो या फिर मल मूत्र की कहीं भी निवृत्ति हो। हम विचार और व्यवहार दोनों के स्तर पर नीचे गिर रहे हैं, ये सभी आज समाज में हमारे व्यवहार से परिलक्षित भी हो रहे हैं।

सामाजिक ज़िम्मेदारी हो या व्यवहार, प्रकृति संरक्षण हो या परिवेशीय सजगता व संवेदनशीलता हर कदम पे हम पिछड़ रहे हैं।

हम सूरत से इनसान पर सीरत से हैवान बन रहे हैं। विकृत मस्तिष्क ने समाज में अज़ाम मचा रखा है। बलात्कार, अपहरण, चोरी, छेड़छाड़, हत्या, आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध कुकर्म दिनों दिन बढ़ रहे हैं।

कृपया शिक्षा के वास्तविक लक्ष्य को समझें रोबोट नहीं मानव निर्माण करें।

आज अंकों के तराज़ू में प्रतिभा तोली जा रही है जो बुद्धि की असंवेदनशील लड़ाई है जिसमे वास्तविक प्रतिभा का केवल दमन ही होता है,वो प्रतिभा जो समाज के काम आ सकती थी।


डॉ ऋषि शर्मा | वरिष्ठ प्रबंध संपादक

एस. चाँद प्रकाशन समूह लिमिटेड

एवं संस्थापक और प्रमुख

हिंदगी ,हिंदी है ज़िंदगी समूह

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