शातिर धर्म गुरुओं की जाल में फंसता मासूम बचपन और युवा

Updated: Aug 5

गांधी जी के अनुसार - "मनुष्यता ही सबसे बड़ा धर्म है"।


जिस तरह डॉक्टर या इंजीनियर के बच्चे जन्म लेते ही डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बनते। बच्चो को पहले शिक्षा लेनी पड़ती है, पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना पड़ता है। तब जाकर वह कुछ बनते है। जरूरी नहीं कि वह भी मां बाप जैसा बने , बच्चे अपनी पसंद से कैरियर चुनते हैं और कुछ नया करते हैं।

फिर क्यों ? बच्चों को जन्म होने पर उसे उसके मां-बाप के धर्म का बनाया जाता है ? धर्म में भी ऐसा होना चाहिए कि बच्चे को पहले सभी धर्मों का ज्ञान दिया जाए बड़े होकर वह अपने धर्म का चुनाव करें।

अगर सरकार मानती है कि 18 साल से छोटा बच्चा नाबालिग होता है 'नासमझ' होता है तो हम उसे कैसे किसी धर्म का बच्चा कह सकते हैं। जब उसे धर्म की समझ ही नहीं।

क्या उसे 18 साल से पहले धर्म की समझ होगी जब वह नाबालिग है ?

आज हमारे समाज में धर्म ऐसा मुद्दा है जिसे हम सदियों बाद भी नहीं सुलझा पाए हैं। दंगे आए दिन होते रहते हैं कभी 'लव जिहाद'के नाम पर तो कभी 'एनआरसी' और 'सीएए ' को लेकर पर सब में मुद्दा एक ही रहता है 'धर्म'।



क्या है 'धर्म' ?

  • गांधी जी के अनुसार - "मनुष्यता ही सबसे बड़ा धर्म है"।

  • भगवान बुद्ध के अनुसार - "धम्म जीवन की पवित्रता बनाए रखना और तथ्य-ज्ञान में पूर्णता प्राप्त करना है,साथ ही निर्वाण प्राप्त करना और तृष्णा का त्याग करना है। इसके अलावा भगवान बुद्ध ने सभी संस्कार को अनित्य बताया है। भगवान बुद्ध ने मानव के कर्म को नैतिक संस्थान का आधार बताया है।"

  • हिंदू धर्म के अनुसार - "यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धिः स धर्म। " (जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। )

  • जैन धर्म के अनुसार - "अपनी आत्मा का कल्याण करके, अपनी आत्मा को संसार से निकालकर, मोक्ष ले जाना ही जैन धर्म का मार्ग है"।

  • इस्लाम के अनुसार - "इस्लाम धर्म का जन्म मानवता के जन्म के साथ ही हुआ है, ईश्वर ने मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही अपना मार्गदर्शन उसे इस्लाम धर्म के रूप में प्रदान किया"।

  • सिख धर्म के अनुसार - "सिख दर्शन के मुख्य सिद्धांत हैं त्याग, ईश्वर में आस्था, मानव के प्रति प्रेम और गुरुओं के प्रति आज्ञाकारिता। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सिख धर्म नैतिक जीवन और ईश्वर में विश्वास के सिद्धांतों को बहुत महत्व देता है"।

  • ईसाई धर्म के अनुसार - "त्रित्व त्रित्व ईसाई धर्म का केंद्रीय तथा गूढ़तम धर्मसिद्धांत ईश्वर के आभ्यंतर स्वरूप से संबंधित है जिसे ट्रिनिटी अर्थात् त्रित्व कहते हैं"। त्रित्व का अर्थ है कि एक ही ईश्वर में तीन व्यक्ति हैं -- पिता, पुत्र तथा पवित्र आत्मा (फादर, सन ऐंड होली गोस्ट)। ... उस पवित्र आत्मा को भी वह ईश्वरीय गुणों से समन्वित मानते हैं।

  • श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार 'कर्म ही सबसे बड़ा धर्म है'।

मैंने आप सभी को बहुत से धर्मो की परिभाषा इसलिए बताई क्योंकि आपने शायद ही सारे धर्मों को पढ़ा होगा।

मुझे भी इन अनेक धर्मों को जानने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी क्योंकि हमें कभी भी सभी धर्मों का ज्ञान नहीं दिया गया।

हां पर मैं हूं 'हिंदू'। कहने को तो आप मुझे अंधभक्त भी कह सकते हो क्योंकि जब तक मुझे जिस धर्म की जानकारी नहीं होगी तब तक मैं वह कैसे बन सकती हूं।

मैं इसलिए हिंदू हूं क्योंकि मेरे मां-बाप हिंदू है। मुझे कभी दूसरे धर्मों को जानने का मौका ही नहीं मिला।

  • कहने को तो हमारे भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 ,26 ,27 और 28 में देश के हर नागरिक को 'धर्म की स्वतंत्रता' का अधिकार दिया गया है।

  • पर हम लोग जानते ही कितने धर्मों को हैं ?

अगर दिल्ली के सरकारी स्कूलों में छठी कक्षा के पाठ्यक्रम में 'बाल राम कथा' पुस्तक को पढ़ाया जा सकता है तो दूसरे धर्म की पुस्तकों को क्यों नहीं ?

अभी कुछ दिनों पहले में बच्चों को वही पुस्तक पढ़ा रही थी तभी एक मुस्लिम लड़की ने बोला "दीदी मुझे यह नहीं पढ़ना है हम कुरान पढ़ते हैं हम मुस्लिम हैं"।

तब मुझे लगा कि इन बच्चों को किसने धर्म सिखाया ? इन्हें अभी से किसने इनको धर्म का लाइसेंस दिया ? उस उम्र में जब इन्हें दुनिया को समझने की जरूरत है।

इसी मसले पर मैंने एक अध्यापक से कुछ प्रश्न किए उन्होंने उत्तर दिया कि "बाल राम कथा पुस्तक इसलिए है ताकि बच्चे अच्छी बातें सीख सकें"| पर क्या दूसरे धर्म में अच्छी बातें नहीं है? अगर बच्चे को अच्छी बातें सिखाने थी तो वह सभी धर्मों से कुछ हिस्सा ले सकते थे। जैसे

  • मुस्लिम धर्म से संबंध रखने वाले एपीजे अब्दुल कलाम

  • क्रिश्चियन धर्म से संबंध रखने वाले मदर टेरेसा और नेल्सन मंडेला

  • हिंदू धर्म से संबंध रखने वाले स्वामी विवेकानंद

  • पिछड़ी जाति में जन्मे भीमराव अंबेडकर और ज्योति राव फूले

अगर सभी धर्मों से मिलकर एक ऐसी पुस्तक होती तो वह समाज में ज्यादा अच्छा संदेश देती | फर्क नहीं पड़ता कि अच्छा मनुष्य किस धर्म और जाति का है | हमें जरूरत है कि सभी धर्मों के अच्छे लोगों की बातें बच्चों को बताई जाए ताकि वह समाज में एक अच्छा मनुष्य बन सके जिसका सबसे बड़ा धर्म मनुष्यता हो |

  • अगर कोई व्यक्ति किसी धर्म में रुचि नहीं रखता तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह संस्कारी और अच्छा मनुष्य नहीं है |

शातिर धर्मगुरुओं ने संस्कार अच्छाई और धर्म को इस तरह जोड़ दिया है कि कोई भी मनुष्य धर्म से दूर जा ही ना पाए। इन प्रश्नों को समाज में कोई उठाता ही नहीं | इसका सबसे बड़ा कारण है निरक्षरता , लोगों को जैसी चीजें बताई जाती हैं वह गीली मिट्टी की तरह उसी रूप में ढल जाते हैं और फिर यह समाज छोटे बच्चों को भी वही सब सीखाता है | यह पूरा धर्म गुरुओं द्वारा बनाया गया जाल है| बच्चा समझदार होने तक बेड़ियों में बंध जाता है | धर्म से दूर होने की तो वह सोच भी नहीं पाता | उसमें इतना जहर पहले ही भर दिया जाता है कि अगर कोई उसके धर्म के विरुद्ध बोले तो सांप्रदायिक दंगे होते हैं | जिनमें ज्यादातर आजकल युवा होते हैं |

  • यहीं से शुरू होता है 'अंधे भक्तों' का खेल। जिसे कोई समझाना नहीं चाहता क्योंकि जो बहुमत है लोग वही बहुमत चाहते हैं। आखिर भारत है, यहां वोट भी तो धर्म के नाम पर डालना होता है। अंधी राजनीति के लिए अंधे भक्तों को बढ़ाया जाता है, जो प्रशन ही ना करें।

  • इस बुरी राजनीति के चलते अनजाने में युवाओं अपने भविष्य को बर्बाद करते हैं। हमें इस बुरी राजनीति को खत्म करने की आवश्यकता है और यह तभी संभव होगा जब अंधे भक्त नहीं होंगे। आज भी बहुत से ऐसे युवा संगठन है, जिन्हे आप बहुत अच्छे से जानते होंगे मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है। जो धर्म गुरु बनते हैं, धर्म के नाम पर लड़ वाते हैं, बिना धर्म को जाने और समझे।

  • हमें आवश्यकता है कि बच्चों को बचपन में सभी धर्मों का ज्ञान दें और 18 साल की उम्र के बाद ही वह अपना धर्म चूने। उससे पहले वह सभी धर्मों को समझे

  • जब वह सभी धर्मों को पढ़कर धर्म चुनेगा तो अंधा भक्त नहीं बनेगा और ना ही धर्म को लेकर गलतफहमी उत्पन्न होंगी।

  • 18 साल से नीचे बच्चे को किसी भी धर्म का ना बोला जाए ताकि उसके अंदर कोई ज़हर ना घोले। जिस तरह चुनाव होते हैं इसी तरह धर्म का चुनाव हो, सभी लोग सारे धर्मों को समझ कर एक धर्म को पसंद करें या एक से ज्यादा को यह उसकी मर्जी होगी और बाद में उन्हीं धर्मों में और ज्यादा ज्ञान प्राप्त कर सके।जैसा शिक्षा प्रणाली में होता है बच्चा पहले अपने पसंदीदा विषय चुनता है और उसमें कुछ बनता है।

read- शिक्षा प्रणाली में पुन: मूल्यांकन

  • सबसे अच्छी बात तो इससे यह होगी कि धर्मगुरु धर्मगुरु शातिर नहीं समाज सुधारक होंगे | आज हमारे समाज में है कि कुछ नहीं है तो बिना ज्ञान के बाबा बन जाओ। आश्रम जैसी सीरीज आज के समय में लोगों के सामने इन चीजों को ला रही हैं।

धर्म के मामलों में युवाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। कारण है 'बेरोजगारी'। जिस उम्र में उन्हें पढ़ने और नौकरी की जरूरत होती है, ना मिलने पर वह भी धर्म को बचाने के नाम पर फालतू के सांप्रदायिक दंगे करते हैं और किसी संगठन का हिस्सा बन जाते हैं।

युवा शक्ति का गलत उपयोग करके धर्मगुरु अपने धंधों को और मजबूत बना रहे हैं । भारत में दंगे और उसके कारणों को लेकर बहुत कम जानकारी उपलब्ध है जिसका कारण है|

  1. सही आंकड़े ना मिल पाना

  2. सांप्रदायिक दंगों के केस का लंबा चलना

काफी रिपोर्ट से पता चलता है कि दंगे होते नहीं कराए जाते हैं इसमें मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं | अफवाहो की भरमार और नफरत भरी बातें स्थानीय तौर पर सांप्रदायिक दंगों को जन्म देती हैं| जो कुछ देर में सोशल मीडिया के जरिए तुरंत ही पूरे देश में फैल जाती हैं | क्योंकि भारत में प्रौद्योगिकी तो लगभग सभी के पास आ चुकी है पर अभी तक लोग बहुत ज्यादा सजग नहीं हुए हैं | वह गलत बातों को भी सही मान बैठते हैं | आँख मूंद कर अफवाहों पर यकीन कर लेते है | सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए मीडिया और सोशल मीडिया पर कंट्रोल बहुत जरूरी है |


मेरा प्रश्न यह है कि आज कितने दलित पिछड़े वर्ग के लोग और महिलाएं मंदिरों में पंडित है ? नहीं है तो क्यों नहीं है?

  • यहां भी तो हमें वंशवाद प्रथा को खत्म करने की आवश्यकता है। धर्मगुरु अनपढ़ नहीं पढ़ा लिखा हो ,इसका अर्थ यह नहीं कि उसे सारे विज्ञान और गणित के सूत्र याद हो , इसका अर्थ है कि उसे अपने धर्म के अलावा भी सभी धर्मों का ज्ञान हो | उसे हम धर्मगुरु बनाए भलहि वह किसी भी जाति धर्म या लिंग का हो।

  • जब ऐसा होगा तो समाज में अपने आप सुधार आएगा। दलितों को उठने का मौका मिलेगा, पिछड़ों को आगे आने का और महिलाओं को बराबरी का तभी देश में तरक्की होगी।

  • ' शातिर धर्मगुरु' ही समाज में परेशानियों की जड़ है हमें इन्हें खत्म करने की आवश्यकता है वरना कुछ लोग धर्म के नाम पर देश को खोखला कर देंगे और लोगों को धर्म के नाम पर लड़वाते रहेंगे।

मेरे हिसाब से 'धर्म' व्यक्तिगत चीज है | तुम्हारा धर्म वही है जिसे तुम ने स्वयं बनाया हो | जिसे तुम्हारी आत्मा ने स्वीकार किया हो |

  • भारत विश्व में सबसे युवा शक्ति देश है मतलब सबसे ज्यादा ताकतवर बस जरूरत है उनकी ताकत का प्रयोग देश को सशक्त बनाने मैं करें ना कि धर्म के मुद्दों पर युवाओ को लड़ाने में।

  • धर्म को लेकर भविष्य में शंकाएं नहीं आशाएं हों कि 'भारत एक मिले-जुले धर्म वाले लोगों का देश है' यही चीज भारत को सबसे अलग और खूबसूरत बनाती हैं और इससे से ही बनता है 'अनेकता में एकता' का नारा।

Related article

  1. भारत में बलात्कार की जमीनी हकीकत

  2. महिलाएं भी आजादी चाहती हैं

  3. क्या भारत में ऑनलाइन शिक्षा 'असमान स्कूली शिक्षा' का कारण है?

  4. किसान बिल बनाम किसान आन्दोलन

  5. हिंदुत्व की आँच पर पकता ‘लव जिहाद’ का सियासी कोरमा


Innocent childhood and youth gets caught in the trap of vicious religion gurus

Just as the children of doctors or engineers do not become doctors or engineers as soon as they are born.

Children have to get education first, get full knowledge. Then they become something. It is not necessary that he too becomes like a parent, children choose a career of their choice and do something new.

Why then? When children are born, they are made into the religion of their parents? In religion too, it should be so that the child is first given the knowledge of all religions and grow up and choose his religion.

If the government believes that a child younger than 18 years of age is a minor, then how can we call him a child of any religion. When he does not understand religion.

Will he have an understanding of religion before 18 when he is a minor?

Today, religion is an issue in our society that we have not been able to resolve even after centuries. Riots keep happening every day, sometimes in the name of 'Love Jihad', sometimes on the issue of 'NRC' and 'CAA', but the issue remains the same ‘Religion’.

What is 'religion'?

  • According to Gandhi - "Humanity is the greatest religion".

  • According to Lord Buddha - "Dharma is to maintain the purity of life and attain perfection in fact-knowledge, as well as attain nirvana and renounce trishna. Apart from this, Lord Buddha has described all rites as eternal. Lord Buddha described human Karma has been described as the basis of an ethical institution. "

  • According to Hinduism - "Yato Abhudanyanishreyas Siddhi: S Dharma" (The work that leads to the attainment of Abhyudaya and Nishreyas is Dharma.)

  • According to Jainism - "Taking your soul out of the world, taking your soul to salvation, is the way of Jainism".

  • According to Islam - "The religion of Islam is born with the birth of humanity, God gave his guidance as the religion of man as well as the origin of man".

  • According to Sikhism - "The main principles of Sikh philosophy are renunciation, faith in God, love for human beings and obedience to the Gurus. Thus it can be said that Sikhism attaches great importance to the principles of moral life and belief in God. is".

  • According to Christianity - "Trinity Trinity is the central and esoteric doctrine of Christianity related to the inner form of God, which is called Trinity". Tritva means that there are three persons in the same God - Father, Son and Holy Spirit (Father, Sun and Holy Gost). ... He considers that Holy Spirit also in harmony with divine qualities.

  • According to Srimad Bhagwat Geeta, 'Karma is the greatest religion'.

I have told you the definition of many religions because you have hardly read all the religions.

I also had to work very hard to learn these many religions because we were never given knowledge of all religions.

Yes, but I am a Hindu. You can even call me a blind devotee to say that, as long as I do not know the religion, how can I become that.

I am Hindu because my parents are Hindu. I never got a chance to know other religions.

  • Yes it is correct in our Indian constitution, every citizen of the country has been given the right to 'freedom of religion' in Articles 25, 26, 27 and 28.

  • But we know how many religions are there?

If 'Bal Ram Katha' can be taught in the sixth grade syllabus in government schools of Delhi, then why not other religions?

Just a few days ago I was teaching the same book to children, when a Muslim girl called "Didi I don't want to read this, we read Quran, we are Muslim".

Then I wondered who taught these children religion? Who gave them the license of religion from now on? In the age when they need to understand the world.

On this issue, I asked a teacher some questions, he replied that "Bal Ram Katha book is so that children can learn good things". But isn't there good things in other religions? If the child were to teach good things, then he could get some share from all religions. like

  • APJ Abdul Kalam who belongs to Muslim religion

  • Mother Teresa and Nelson Mandela from Christianity

  • Swami Vivekananda who belongs to Hinduism

  • Bhimrao Ambedkar and Jyoti Rao Phule, belonging to lower caste

If there was such a book consisting of all religions, it would give a better message in the society, no matter what religion and caste a good person is. We need that the good people of all religions should be told to children so that they can understand the difference between religion and goodness. The vicious religious leader left no difference in goodness and religion to run his business. So that no human being can get away from religion. No one in the society raises these questions. The biggest reason for this is illiteracy, things are told to people, they get molded in the same way as wet soil, and then this society also teaches the same thing to young children. This entire religion is a trap created by the Gurus. The child is bound in shackles till he is sensible. He cannot even think of getting away from religion. There is so much poison already filled in person that if someone speaks against his religion, then there are communal riots, in which mostly youth involve.

  • The game of 'blind devotees' starts from here. Which no one wants to explain because people want the majority which is the majority, because in India vote is given in the name of religious due to which politics leader frame a religious propaganda to gain importance and victory. Blind devotees are blinded to blind politics, who should not question.

  • Due to this bad politics, youths inadvertently ruin their future. We need to end this bad politics and this will be possible only when there are no blind devotees. Even today, there are many youth organizations, which you must know very well, there is no need to tell me. Those who become dharma gurus, fight in the name of dharma, without knowing and understanding dharma.

  • We need to give children the knowledge of all religions in childhood and only after the age of 18 years, they lose their religion. Before that he understood all religions

  • When he chooses religion after reading all the religions, then he will not become blind devotee nor will misconceptions about religion arise.

  • The child below 18 years should not be spoken of any religion so that no poison is injected into him. Just as elections are held, in the same way, religion should be chosen, everyone should understand one religion by understanding all the religions or more than one it will be his wish and can get more knowledge in the same religions. As in the education system, the child first chooses his favorite subject and makes something in it.

  • The best thing will be that the religious leaders will not be illiterate, as if there is nothing in our society today, then become Baba. Series like Ashram are bringing these things in front of people in today's time.

The reason youth is more interested in religion nowadays is 'unemployment'. In the age at which they need to study and get jobs, if they are not found, they also commit unnecessary communal riots in the name of saving religion and become part of any organization.

By misusing youth power, religious leaders are strengthening their businesses.

There is very little information present about the riots in India and the reasons behind it.

  1. Not getting the correct figures

  2. Communal riots case prolonged

A lot of reports show that media and online platforms play a big role in the way riots do not take place. A lot of rumors and hateful things lead to communal riots locally. In a short period of time, through social media, it spreads immediately throughout the country. Because technology has come to almost everyone in India, but people are still inspectors, they accept wrong things as right. They blindly believe the rumors. Control of media and social media is very important to prevent communal riots.

My question is, how many Dalit backward class people and women are pandits in temples today? If not, why not?

  • Here too we need to abolish dynastic practice. Religious leaders should always be educated, it does not mean that he has to remember all the science and mathematics formulas, it means that anyone who has knowledge of all religions, become a religious teacher regardless of their caste, religion or gender.

  • When this happens, the society will improve itself. Dalit’s will get a chance to rise, the backward to come forward and women will be equal Only then will the development of the country be possible.

  • 'Uneducated religious teacher' is the root cause of problems in the society. We need to end them or else some people will make the country hollow in the name of religion and keep fighting people in the name of religion.

According to me, 'religion' is a personal thing. Your religion is what you yourself have created. Which your soul has accepted.

  • India is the youngest power country in the world, that means the most powerful is needed only to use their power to empower the country and not to fight the youth on the issues of religion.

  • There should be no doubt in the future about religion, that 'India is a country of people of a mixed religion'. This is what makes India the most different and beautiful and it is the slogan of 'unity in diversity'.

The writer is student of journalism at DU



HOME PAGE

CLICK TO READ MORE ARTICLES


272 views0 comments