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आजाद भारत और नेहरू की सोवियत रूस यात्रा

Updated: Aug 5, 2022

द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद का दौर वो दौर था जब दुनिया पूंजीवाद और साम्यवाद के दो खेमों में बंट चुकी थी, इस दौरान सोवियत रूस साम्यवादी गुट का नेतृत्व करता था, जबकि पूंजीवादी देशों का अगुवा अमेरिका था।

भारत को तब नई-नई आजादी मिली थी, देश को उन उद्योगों की जरूरत थी जिससे विकास के लिए बुनियादी ढांचा खड़ा किया जा सके, जैसे स्टील, एयरक्राफ्ट, ऑटो इंडस्ट्री, पनबिजली परियोजना आदि।


नेहरू भारत के इन्हीं सपनों को लिए 1955 में सोवियत रूस की यात्रा पर निकले थे, नेहरू को आधुनिक भारत के मंदिरों का निर्माण करना था और इसका उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया है।


नेहरू ने सोवियत रूस की यात्रा 7 जून 1955 को याकेतरिनबर्ग से शुरू की, उनके साथ उनकी बेटी और भारत की भावी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी थीं, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत रूस के इस शहर में बड़े पैमाने पर लोहा गलाकर स्टील बनाया जा रहा था।


नेहरू द्वारा की गई सोवियत रूस की इस महायात्रा ने भारत-रूस के बीच दोस्ती के एक ऐसे रिश्ते की गांठ जोड़ी, जिस पर भारत और रूस आज तक इतराते हैं।


नेहरू मास्को से लेनिनग्राद की वृहद यात्रा पर निकले, इस दौरान उन्होंने स्टालिनग्राद, क्रीमिया, जॉर्जिया, अस्काबाद, ताशकंद, समरकंद, अल्टाई क्षेत्र, मैग्नीटोगोर्स्क और सवर्दलोव्स्क शहरों का भ्रमण किया।


सवर्दलोव्स्क शहर का नाम बदलकर अब याकेतरिनबर्ग हो गया है, इस शहर को सोवियत रूस की स्टील राजधानी कहते हैं, इस शहर में मौजूद हैवी इंजीनियरिंग प्लांट उर्लमाश से नेहरू काफी प्रभावित हुए।


उर्ल पहाड़ों की श्रृंखला में बसे इस शहर ने नेहरू का दिल जीत लिया, बाद में उर्लमाश कारखाने में ही बोकारो स्टील प्लांट के लिए भारी-भरकम मशीन बनाई गई, फिर उन्हें भारत लाया गया, तमिलनाडु में बने कूडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट के लिए भी रूस के इस प्लांट ने भारी यंत्र भारत को मुहैया कराए हैं।


16 दिन बाद 23 जून 1955 को जब नेहरू इंदिरा गांधी के साथ रूस की यात्रा से लौट रहे थे, तब वे इस देश में लगभग 13,000 किलोमीटर की यात्रा तय कर चुके थे, नेहरू ने सोवियत रूस की वृहद यात्रा की, 1955 में साम्यवादी रूस ने आजाद भारत के पहले पीएम का दिल खोलकर स्वागत किया।


जबर्दस्त खेमेबंदी के दौर में रूस को अपने साथ भारत जैसा विशाल देश मिला था जो साम्यवाद की विचारधारा के साथ चलने को तैयार था, नेहरू यहां के कारखाने, विश्वविद्यालय, स्कूल, कॉलेज, औद्योगिक शहर, संग्रहालय और स्टेडियम गए, उन्होंने एक देश की अर्थव्यवस्था देखी, उसका इतिहास और समाज समझा, सरकार चलाने के एक स्थापित सिस्टम से परिचित हुए।


नेहरू की इस यात्रा के साथ ही भारत में दो आधुनिक स्टील प्लांट लगने का रास्ता खुल गया, ये स्टील प्लांट थे भिलाई और बोकारो, दूरदर्शी नेहरू स्टील की ताकत से पहले ही परिचित थे, एक जगह वे लिखते हैं, "स्टील अर्थव्यवस्था की ताकत का प्रतीक है, ये भविष्य के भारत का गर्व का सूचक है।"


नेहरू के सामने चिंता न सिर्फ अपने देश में स्टील प्लांट लगाने की थी, बल्कि एक चुनौती तकनीकी हस्तांतरण की भी थी, भारत जैसे नये-नवेले देश को ये तकनीक कोई भी सक्षम देश सह्रदयता से देने को तैयार नहीं था, लेकिन निकिता क्रुश्चेव के दौर के रूस ने भारत की जरूरतों का सम्मान किया और भारत में दो स्टील प्लांट बनाने के लिए जरूरी सामान और तकनीक देने पर राजी हो गया।


रूस के इंजीनियर बोकारो और भिलाई आए, यहां पर उन्होंने भिलाई और बोकारो स्टील प्लांट को बनाने में पूरी मदद की, भिलाई भारत का पहला आधुनिक सरकारी स्टील प्लांट है, बोकारो का कारखाना इसके बाद अस्तित्व में आया।


नेहरू के इस लंबे दौरे से भारत और सोवियत रूस के बीच दोस्ती इस कदर परवान चढ़ी कि उसी साल नवंबर के महीने में निकिता क्रुश्चेव रूस के प्रधानमंत्री निकोलाई बुलगैन के साथ भारत दौरे पर आ पहुंचे, एक महाशक्तिशाली देश के राष्ट्रपति का किसी कमजोर तथा नये-नवेले देश के दौरे पर आना अपने आप में एक अनूठा उदाहरण था जो नेहरू जी की दूरदर्शिता तथा विलक्षणता को दर्शाता है।


लेखक-शिवकुमार शौर्य (संस्कृति विभाग लखनऊ)






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