किसान बिल बनाम किसान आन्दोलन

Updated: Aug 5

देश के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने सन 1965 में दिल्ली के रामलीला मैदान में जय-जवान के साथ जय किसान भी जोड़ा था।


भारत कृषि प्रधान देश है। देश की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है। निर्भरता चाहे खाद्यान्न की हो या आर्थिक दोनों ही स्वरूप में किसान इसकी धुरी है। इसलिए इसको अन्नदाता कहा जाता है। कहा यह भी जाता है कि किसान जमीन का पेट चीर कर देशवाासियों का पेट भरता है, परन्तु भारतीय किसान कभी भी आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं रहा है। हां, अपवाद हो सकते है। स्वतंत्र भारत से पूर्व किसान की आर्थिक स्थिति और आज की आर्थिक स्थिति में जो बदलाव आने चाहिए वह संतोष जनक नहीं कहे जा सकते। देश के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने सन 1965 में दिल्ली के रामलीला मैदान में जय-जवान के साथ जय किसान भी जोड़ दिया था। भारतीय संसद और प्रदेषों की विधान सभाओं में समय समय पर सरकारों ने किसान के हितैशी होने और उनकी आर्थिक उन्नति के लिए अनेक प्रयास और प्रयोग किए। साथ ही समय समय पर किसानों ने भी अपने हितों की रक्षा के लिए आंदोलन किए। विवष होकर आत्म हत्या जैसे कठोर निर्णय लेने पड़े, परन्तु परिस्थितियों में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन दिखाई नहीं दिया।

वर्ष 2004 से 2006 के बीच राश्ट्रीय किसान आयोग ने प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 5 रिपोर्ट भारत सरकार को सोंपी। जिनमें किसानों की समस्याओं और उनसे होने वाली निरंतर आत्महत्याओं के कारणों को जानने एवं उनके राष्ट्रव्यापी निराकरण हेतु कृषि को राज्यों की सूची के बजाए समवर्ती सूची में लाने, फसलों के समर्थन मूल्य को लागत की 50 प्रतिषत तक बढ़ाने एवं भूमि सुधार कानून सहित अनेक सुझाव थे।

वर्ष 2014 में भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। किसानों की आर्थिक स्थिति ने प्रमुखता ली। एक बार पुनः किसानों की स्थिति को सुधारने की प्रतिबद्धता दोहराई गई। किसानों की आर्थिक स्थिति को लेकर अनेक आर्थिक पैकेजों की घोषणा की गई।

5 जून, 2020 को भारत सरकार द्वारा किसानों की आय बढाने के लिए एक अध्यादेश लाया गया। जिसे 14 सितम्बर, 2020 को लोक सभा में प्रस्तुत किया गया जिसका उद्देश्य कृषि उपज, व्यापार एवं वाणिज्य को सरलीकरण करना था तथा 17 सितम्बर, 2020 को लोक सभा तथा बाद में राज्य सभा में पारित कर दिया गया।


कृषि से जुड़े 3 बिल भारतीय संसद से पारित होकर कानून बने। ये तीन बिल निम्न प्रकार हैं:

1. पहले बिल के अन्तर्गत किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए स्वतंत्र किया है ताकि वे अपनी फसलों को बेचने के लिए अपने क्षेत्र से बाहर देश के किसी भी भाग में अच्छी कीमत पर जा सकें।

2. दूसरे बिल के माध्यम से किसानों को खुदरा व्यापारियों के साथ-साथ बड़े व्यापारियों के साथ मिलकर खेती को अच्छी किस्म तैयार करने के लिए उपयोगी उपकरण, बीज एवं अन्य तकनीकि सहयोग प्राप्त हो सकेगा। यह बिल किसान को कर्ज की सहूलियत और फसल बीमा की सहूलियत भी देता है।

3. तीसरे बिल के में अनाज, दलहन, खाद्य तेल एवं आलू तथा प्याज को आवष्यक चीजों की सूची से हटाने का प्रावधान है ताकि किसानों को इस उपज का अच्छी कीमत मिल सकेगी।

उपरोक्त बिलों के प्रति किसानों में कुछ आशंकाएं उत्पन्न हुई हैं जो निम्न प्रकार हैं:

1. पहले बिल के प्रति किसानों की आशंका है कि सरकार इस बिल के माध्यम से किसानों को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य को समाप्त करना चाहती है तथा कालान्तर में सरकारी मण्डियाँ समाप्त हो जाएंगी और इससे किसान व्यापारियों को उनके हिसाब से कम कीमत पर अपनी फसल को बेचने के लिए बाध्य होंगे।

2. इस बिल के प्रति किसानों की आशंका है कि कांट्रेक्ट के नाम पर बड़ी कम्पनियाँ किसानों का षोशण करेंगी तथा कम्पनियाँ उनकी जमीन हड़प लेंगी।

3. इस बिल को किसान इस आशंका से देखता है कि यदि उपरोक्त खाद्यान्न का न्यूनतम समर्थन मूल्य न होने के कारण व्यापारी किसानों से कम कीमत पर खरीदेगा और अपना लाभ लेकर उच्च दामों पर बेचेगा। जिससे एक ओर किसानों पर तो मार पड़ेगी ही साथ ही मंहगाई भी बढ़ेगी।


किसान चाहता है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य बनाए रखे, मण्डियो की यथास्थिति बनी रहे, उनकी जमीन सुरक्षित रहे और न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम खरीदारी पर व्यापारियों कानूनी सजा का प्रावधान हो।


सरकार और किसान नेताओं के साथ हुई कई दौरों की बातचीत के माध्यम से सरकार किसानों की आशंकाओं पर विचार कर उन्हें सुलझाने का प्रयास भी कर रही है। परन्तु किसान सरकार के प्रयासों से संतुष्ट नहीं हैं। किसानों का मानना है कि इन बिलों में संशोधन से उनकी आशंकाएं समाप्त नहीं होंगी। वे चाहते हैं कि इन बिलों को सरकार वापस ले और उनसे बात करके नया बिल लाया जाए।


मेरे व्यक्तिगत विचार से यह मामला बिल की अच्छाई और बुराई से ज्यादा आशंकाओं और उनके निराकरण का है जिसे आपसी बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। किसानों को भी बिल से होने वाली कठिनाईयों की व्यावाहरिक समस्याओं को सरकार के सामने लिखित रूप में रखना चाहिए और सरकार को भी उन समस्याओं के समाधान के लिए खुले मन से विचार कर आवश्यक सुधार करने चाहिए। अनिश्चित कालीन टकराव न किसानों के हित में हैं, न देश और न जनता के।


Farm Bill vs Farmers protest

India is an agricultural country. Most of the country's population is dependent on agriculture. Farmers are the axis of dependence, whether in food or economic. Therefore it is called Annadata. It is also said that the farmer rips the land and feeds the countrymen, but the Indian farmer has never been financially prosperous. Yes, there can be exceptions. Before independent India, the economic situation of the farmer and the changes that must be made in today's economic situation cannot be called satisfactory. In 1965, the second Prime Minister of the country, Mr. Lal Bahadur Shastri, had also added Jai Kisan with Jai-Jawan at Ramlila Maidan in Delhi. In the Indian Parliament and State Legislative Assemblies, from time to time, the governments made many efforts and experiments for the welfare of the farmer and their economic progress. Also, from time to time, peasants also made agitations to protect their interests. It had to take tough decisions like self-murder, but no big change in the circumstances was seen.

Between 2004 and 2006, the National Commission for Farmers recommended Prof. M / s. Presented 5 reports under the chairmanship of Swaminathan to the Government of India. There were many suggestions, including bringing the agriculture to the concurrent list instead of the list of states, raising the support price of crops to 50 percent of the cost, and the Land Reforms Act to address the problems of the farmers and the reasons for their continuous suicides. .


The year 2014 saw a major change in Indian politics. The economic condition of the farmers took prominence. The commitment to improve the status of farmers was once again reiterated. Several economic packages were announced regarding the economic status of the farmers.

On 5 June 2020, an ordinance was introduced by the Government of India to increase the income of farmers. Which was presented in the Lok Sabha on 14 September 2020 with the aim of simplifying agricultural produce, trade and commerce and was passed on 17 September 2020 in the Lok Sabha and later in the Rajya Sabha.


3 bills related to agriculture were passed by the Indian Parliament and became law. These three bills are as follows:

1. Under the first bill, farmers have been freed to sell their crops so that they can go out of their region to sell their crops at a good price in any part of the country.

2. Through the second bill, farmers will be able to get useful equipment, seeds and other technical support to make a good variety of farming with retail traders as well as big traders. This bill also provides the facility of loan to the farmer and crop insurance.

3. In the third bill, there is a provision to remove grains, pulses, edible oil and potatoes and onions from the list of essential things so that farmers will get good price for this produce.

Some apprehensions have arisen among the farmers about the above bills, which are as follows:

1. Farmers are apprehensive about the first bill that the government wants to end the minimum support price provided to the farmers through this bill, and in time the government mandis will be abolished and this will help the farmers to get their crop at a lower price Will be obliged to sell.

2. Farmers are afraid of this bill that big companies will exploit farmers in the name of contract and companies will grab their land.

3. The farmer sees this bill with the fear that if there is no minimum support price of the above food grains, the trader will buy from the farmers at a lower price and sell his profit at higher prices. As a result of which farmers will be killed on the one hand and inflation will also increase.


The farmer wants the government to maintain the minimum support price, maintain the status quo of the media, keep their land safe and provide for traders' legal punishment for purchases below the minimum support price.


Through several rounds of talks with the government and farmer leaders, the government is also considering the fears of the farmers and trying to resolve them. But the farmers are not satisfied with the efforts of the government. Farmers believe that amending these bills will not end their fears. They want the government to withdraw these bills and talk to them to bring a new bill.


In my personal view, this is more a matter of apprehension and redressal of Bill than good and evil, which can be resolved through mutual dialogue. Farmers should also put the problems of problems of the bill in writing in front of the government and the government should also consider it and make necessary reforms to solve those problems with an open mind. Indeterminate conflicts are not in the interest of the farmers, neither the country nor the people.


The writer is Assistant Professor at Delhi University (MAC)


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