चौरी-चौरा शताब्दी वर्ष और महात्मा गांधी के परिप्रेक्ष्य में आजादी का अमृत महोत्सव का महत्व

Updated: Aug 5

देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन के वृहद दावानल में ‘चौरी-चौरा घटना’ एक गौरवपूर्ण चिंगारी है। जिसने ब्रिटिश सत्ता को नेस्तनाबूत कर हमारे तत्कालीन संघर्षपूर्ण इतिहास को गौरवान्वित किया।


चौरी-चौरा, गोरखपुर और देवरिया के मध्य गोरखपुर शहर से 30.5 किलोमीटर दूरी पर स्थित गोरखपुर जिले का एक शहर है। चौरी-चौरा काण्ड के समय (1922) में यह चौरी-चौरा नामक एक गांव जो कि गोरखपुर और देवरिया की कच्ची रोड पर स्थित परगना दक्षिण हवेली के टप्पा केतउली के अन्तर्गत था।


इस आन्दोलन में गोरखपुर शहर की जनता के साथ ग्रामीण गरीब किसानों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। वे जमींदारों, पुलिस व ब्रिटिश कानूनों से उत्पीड़ित थे, जो निरन्तर उनका सामाजिक, शारीरिक व आर्थिक शोषण कर रहे थे। यह किसान व इनके नेता स्वयं को वालंटियर मानते थे। ‘स्वराज’ शब्द का अर्थ इन गरीब किसानों के लिए अंग्रेजो व जमींदारों के अत्याचारों से मुक्ति था। अगस्त, 1920 ई0 में गांधी जी द्वारा सम्पूर्ण देश में असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ किया गया। इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर इनके द्वारा असहयोग आन्दोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया गया। 08 फरवरी, 1921 को गांधी जी द्वारा जनपद गोरखपुर का प्रथम भ्रमण किया गया। गांधी जी ने गोरखपुर की जनता को सम्बोधित करते हुए कहा कि .............‘‘हम अकेले कुछ भी नहीं कर सकते। हिन्दू व मुस्लिम एक साथ मिलकर ही अपने स्वराज का उद्देश्य पूरा कर सकते हैं।’’ ‘‘मुझे आशा है कि यदि हम अपना कर्तव्य निभायेंगे तो सितम्बर से पहले अवश्य ही स्वराज प्राप्त कर लेंगे।’’.............‘‘मुझे विश्वास है कि 30 करोड़ भारतीय इतनी क्षमता रखते हैं कि वे उनके ऊपर शासन करने वाले 1 लाख अंग्रेजों को या तो अपना सेवक अथवा भाई बना सकते हैं या भारत से बाहर कर सकते हैं।’’ उनके आगमन से जिले के लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ा और वे असहयोग आन्दोलन से बड़ी संख्या में जुड़ते चले गये। वे स्वयं को ‘राष्ट्रीय कार्यकर्ता’ कहते थे। उनके द्वारा रात्रि में गश्त दी गई जिससे लोगों में असहयोग आन्दोलन के प्रति सहानुभूति पैदा हुई। प्रतिदिन सरकार के विरोध में जिले के प्रत्येक स्थान पर सभाएं आयोजित की जाने लगीं। शराब की दुकानों का बहिष्कार किया गया तथा ताड़ के पेड़ जिनसे ताड़ी प्राप्त की जाती थी, अंग्रेजों के राजस्व के मुख्य स्रोत थे, उन्हें बन्द कर दिया गया। गोरखपुर की सम्पूर्ण जनता द्वारा खादी वस्त्रों व गांधी टोपी का प्रयोग किया जाने लगा। नवम्बर, 1921 में जिले में हजारों की संख्या में स्वयंसेवकों नें ईश्वर के नाम पर शपथ ली थी, ‘‘वे खद्दर पहनेंगे, अंहिसा का पालन करेंगे, एक सच्चा हिन्दू होने के नाते अस्पृश्यता जैसी बुराइयों का विरोध करेंगे, धार्मिक एकता व मेल मिलाप बढ़ाने का प्रयास करंेगे और सभी तरह की कठिनाइयों (कारागार सहित) का सामना करेंगे’’। जिले में जनवरी 1922 तक अकेले गोरखपुर शहर से लगभग 15000 स्वयंसेवक सूचीबद्ध किए गए और एक गांव जो आन्दोलन को लेकर प्रमुखता से सुर्खियों में आया वह गोरखपुर का चौरी-चौरा गांव था।


चौरी-चौरा के स्थानीय बाजार में शायद ही यूरोपीय वस्त्रों व शराब का कोई क्रेता रहा हो। 01 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा से सटे हुए एक अन्य स्थानीय बाजार मरेरा (मंुडेरा) में शान्तिपूर्ण बहिष्कार किया जा रहा था। चौरा तथा मंुडेरा बाजार में तेल व चीनी मिलें थीं, भारतीय व विदेशी कपड़े की दुकानें तथा मांस-मछली व शराब की कई दुकानें थीं। एकत्रित हुए स्वंयसेवकों द्वारा धार्मिक भावनाओं व स्वदेशी से प्रेरित होकर इन सभी विदेशी दुकानों का शान्तिपूर्ण बहिष्कार किया जा रहा था कि तभी चौरी-चौरा पुलिस स्टेशन के एक सब इंस्पेक्टर गुप्तेश्वर सिंह द्वारा भगवान अहीर नाम के स्वयंसेवक की पिटाई कर दी गई। इसी घटना के तारतम्य में सभी स्थानीय स्वयंसेवक व नेता इस बात पर सहमत हुए कि दिनांक 04 फरवरी, 1922, दिन शनिवार को जिला मुख्यालय से 15 मील पूर्व चोटकी डुमरी (खुर्दा) नामक स्थान पर एकत्रित होंगे व चौरा स्थित पुलिस थाने पहुंच कर सब-इंस्पेक्टर से स्पष्टीकरण मांगा जायेगा कि व किसी अंहिसक स्वयंसेवक को इस तरह कैसे पीट सकते हैं? नेता नजरअली व अन्य संगठनकर्ता स्वयंसेवकों के सम्बोधन के पश्चात् स्वयंसेवकों का समूह जो खादी के साथ ही बड़ी संख्या में गेरूए रंग के वस्त्र और गांधी टोपी पहने थे, ‘गांधी जी जिन्दाबाद’ के नारे लगाते हुए आगे बढ़ा। इन स्वयंसेवकों के विषय में चौरी-चौरा घटना की प्रत्यक्षदर्शी नौजदी पासिन (चौरी-चौरा घटना के एक नायक रामेश्वर पासी की पत्नी थीं) इतिहासकार शाहिद अमीन (पुस्तक Event Metaphor Memry Chauri Chaura - 1922-1992) द्वारा 18 अगस्त, 1988 को दिए गये एक साक्षात्कार में बताती हैं, वह ‘वॉलंटियर’ शब्द के लिए स्थानीय भोजपुरी भाषा में ‘ओटियार’ शब्द का प्रयोग करती हैं, ‘‘ओटियार लोग गेरूआ पहनते थे व चुटकी भी लेते थे चुटकी का तात्पर्य खाने के लिए भिक्षावृत्ति था।’’ धीरे-धीरे चुटकी स्वयंसेवकों द्वारा एकत्र किये जाने वाले अंशदान (चन्दा) में बदल गया। अदालत के दस्तावेजों के अनुसार नौजदी ने बताया कि गेरूआ बस्तर, लाल या साधारण रंगीन वस्त्र चौरी-चौरा स्वयंसेवकों का पहरावा थे। एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार भी पीला (गेरूआ) कुर्ता संयुक्त प्रान्त के स्वयंसेवकों के मध्य विशेष रूप से प्रसिद्ध था।


दिनांक 04 फरवरी को बड़ी संख्या में चौरी-चौरा पहुंच कर स्वयंसेवक पुलिस थाने के सामने जा रूके और सब-इंस्पेक्टर गुप्तेश्वर सिंह द्वारा मुंडेरा बाजार की घटना के लिए स्पष्टीकरण मांगने लगे। कुछ शान्त लोगों द्वारा हस्तक्षेप किये जाने पर सम्पूर्ण मामला शान्तिपूर्ण तरीके से चल रहा था कि तभी पीछे से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आयीं। शान्त विरोधियों द्वारा पुलिस पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया। आगे उपस्थित जन विरोधी समूह ने पीछे मुड़कर कंकड़-पत्थर फेंके जिन पर सशस्त्र पुलिस ने गोलियां चला दीं। गोलियां कब तक चलीं यह जानकारी नहीं है पर इसके परिणामस्वरूप 26 लोग मारे गये। ब्रिटिश पुलिस ने अपनी सुरक्षा के लिए दौड़कर थाने के दरवाजे अन्दर से बंद कर लिए। क्रुद्ध लोगों ने बंद थाने में आग लगा दी जिसमें 21 पुलिस वाले एवं 01 सब इंस्पेक्टर जल कर मर गये। इस घटना में मारे गए पुलिसकर्मियों के नाम इस प्रकार हैं:-

1- इंस्पेक्टर गुप्तेश्वर सिंह

2- सब-इंस्पेक्टर पृथ्वी पाल

3- कांस्टेबल बशीर खान

4- कांस्टेबल कपिल देव सिंह

5- कांस्टेबल लखाई सिंह

6- कांस्टेबल रघुवीर सिंह

7- चौकीदार विशेश्वर सिंह

8- कांस्टेबल मोहम्मद खान

9- कांस्टेबल हसन खान

10- कांस्टेबल गदाबख्श खान

11- कांस्टेबल जामा खान

12- चौकीदार मंगलू चौबे

13- कांस्टेबल रामबली पांडे

14- कांस्टेबल कपिल देव

15- कांस्टेबल इंद्रसन सिंह

16- कांस्टेबल रामलखन सिंह

17- कांस्टेबल मरदाना खान

18- कांस्टेबल जगदेव सिंह

19- कांस्टेबल जयगई सिंह

20- चौकीदार वज़ीरो

21- चौकीदार घिसाई राम

22- चौकीदार कतवारू राम

कुछ समय बाद मुख्यालय से सूचना की पुष्टि की गई जिसमें थाने को सुलगता हुआ पाया गया व मात्र एक चौकीदार सादिक अहमद जीवित पाया गया।


महात्मा गांधी जी को इस घटना की विस्तार पूर्वक सूचना अपने पुत्र देवदास गांधी के माध्यम से मिली। 12 फरवरी, 1922 ई0 को चौरी-चौरा की घटना के मद्देनजर गांधी जी द्वारा असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया गया।


अन्ततः 2 जून, 1922 ई0 को 228 लोगों को सेशन कोर्ट में प्रस्तुत किया गया। सेशन कोर्ट के जज एच0ई0 होम्स द्वारा 225 लोगों को हत्या, जानबूझ कर चोट पहुंचाने, डकैती व आग लगा देने के अपराध हेतु मृत्युदण्ड, 172 लोगों को मृत्युदण्ड की सजा दी गयी थी।


पंडित मदन मोहन मालवीय 04 फरवरी के बाद से ही चौरी-चौरा के सम्पर्क में थे। उनकी छवि पहले से ही किसानों के हितों के रक्षक के रूप में थी। उनके पुत्र के0एन0 मालवीय ने तथ्यों का पता लगाने वाले एक जांच दल के साथ चौरी-चौरा की यात्रा की और सेशन कोर्ट में गिरफ्तार स्वयंसेवकों के बचाव के लिए वकालत की थी।


चौरी-चौरा घटना के लिए दोषी ठहराये गये विद्रोहियों, का 05 वकीलों के एक दल ने हाई कोर्ट में बचाव किया, मालवीय जी की पैरवी व कानूनी लड़ाई के बाद 30 अप्रैल 1923 को, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मामले में अंतिम निर्णय सुनाया, अपीलों पर विचार करने के बाद मृत्युदण्ड की सजा पाये 172 लोंगो में से मात्र 19 लोगों को फांसी की सजा हुई। विवरण निम्न हैं:-

1- अब्दुल्ला,

2- भगवान अहीर,

3- बिकरम अहीर,

4- दुधई,

5- कालीचरन कहार,

6- लवटू कहार,

7- रघुबीर सुनार,

8- रामस्वरूप बरई,

9- रूदली केवट,

10-संपत चमार

11- नज़र अली,

12- लाल मोहम्मद,

13- श्यामसुंदर,

14- महादेव सिंह,

15- मेघु अली,

16- रामलखन,

17- सहदेव,

18- मोहन,

19- सीताराम,


मालवीय जी के तर्क-वितर्क समाप्त हो जाने के उपरान्त मुख्य न्यायाधीश अपनी कुर्सी से खडे़ हुए और उन्होंने मालवीय जी की प्रसंशा इन शब्दांे मे की, ‘‘जिस अद्भुत क्षमता के साथ आपने इस केस की वकालत की है, आपने सभी आरोपियों का आभार अर्जित किया है और उनके परिवार वाले हमेशा आपके प्रति आभारी रहेंगे। मैं स्वयं व मेरे साथी श्रीमान जस्टिस पिगॉट आपको इस केस पर ऐसी बुद्धिमत्तापूर्ण वकालत करने के लिए बधाई देते हैं। आपके अतिरिक्त और कोई भी इस केस को इतनी अच्छी तरह से प्रस्तुत नहीं कर सकता था। एक वकील अपने वकालत के पेशे में इतनी ख्याति अर्जित करने से बेहतर और महत्वाकांक्षा क्या रख सकता है!’’


चौरी-चौरा के अमर शहीदों को निम्नलिखित पंक्तियों में श्रृद्धांजलि अर्पित की जा सकती हैः-


‘‘आओ झुक-कर करें सलाम उन्हें,

जिनके हिस्से में यह मुकाम आता है।

कितने खुशनसीब हैं वो लोग,

जिनका खून वतन के काम आता है।’’

श्रोत

  1. राष्ट्रीय अभिलेखागार ,नई दिल्ली

  2. उत्तर प्रदेश राज्य अभिलेखागार लखनऊ

  3. व्यक्तिगत अभिलेखागार, लखनऊ


मूल लेख - शिवकुमार शौर्य (संस्कृति विभाग, लखनऊ )


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